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SunnyJuly 15, 2018
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जागरूकता के अभाव में पूर्वोत्तर से कई प्रतिभाएं सामने नहीं आ पाती हैं। मैंने यह मुकाम हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत की है। मगर मेरी यात्रा अभी शुरू ही हुई है। चलने के लिए मेरे पास एक लंबा रास्ता है।

बचपन में मैं सारे खेल खेलती थी, लेकिन मेरे गांव वाले मुझसे फुटबॉल खेलने के लिए कहते। शायद इसके पीछे की वजह यही थी कि मेरे पिता भी अच्छे फुटबॉल खिलाड़ी रहे हैं। अट्ठारह साल पहले असम के नगांव जिले के एक छोटे से गांव धींग में मेरा जन्म हुआ था। धींग भारत के उन गांवों में शामिल है, जहां आज भी मोबाइल संचार बेहतर नहीं कहा जा सकता। मैं अपने पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी हूं। मेरे पिता धान की खेती करने वाले किसान हैं।

बचपन में खेला है फुटबॉल
मेरा खेलों से जुड़ाव शुरू से ही रहा, पर न मैंने और न ही मेरे परिवार के किसी भी सदस्य ने एथलेटिक्स को कभी तवज्जो दी। मेरे पिता की आर्थिक हैसियत भी इतनी बेहतर नहीं थी कि वह मुझे खेलों में करियर बनाने के लिए जरूरी ट्रेनिंग मुहैया करा सकें। मैं फुटबॉल जरूर खेलती थी, लेकिन वह भी अपने गांव के स्कूल के बिना घास वाले मैदान पर। लड़के, लड़कियों, मैं हर किसी के साथ खेलती। थोड़ी बड़ी हुई, तो मैंने कुछ स्थानीय क्लबों के लिए भी फुटबॉल खेला और क्लबों के लिए खेलते हुए पहली दफा देश के लिए खेलने का भी ख्वाब देखा।


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एक सलाह पर एथलेटिक्स से जुड़ी

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SunnyJuly 14, 2018
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2min110

हिमा दास ने रचा इतिहास
नई दिल्ली

ऐथलेटिक्स ट्रैक इवेंट में देश को पहली बार गोल्ड दिलाकर इतिहास रचने वाली हिमा दास की कहानी किसी फिल्मी स्टोरी से कम नहीं है। 18 साल की हिमा ने महज दो साल पहले ही रेसिंग ट्रैक पर कदम रखा था। उससे पहले उन्हें अच्छे जूते भी नसीब नहीं थे। असम के छोटे से गांव ढिंग की रहने वाली हिमा के लिए इस मुकाम तक पहुंचना आसान नहीं था। परिवार में 6 बच्चों में सबसे छोटी हिमा पहले लड़कों के साथ पिता के धान के खेतों में फुटबॉल खेलती थीं।

स्थानीय कोच ने ऐथलेटिक्स में हाथ आजमाने की सलाह दी। पैसों की कमी ऐसी कि हिमा के पास अच्छे जूते तक नहीं थे। सस्ते स्पाइक्स पहनकर जब इंटर डिस्ट्रिक्ट की 100 और 200 मीटर रेस में हिमा ने गोल्ड जीता तो कोच निपुन दास भी हैरान रह गए। वह हिमा को गांव से 140 किमी दूर गुवाहाटी ले आए, जहां उन्हें इंटरनैशनल स्टैंडर्ड के स्पाइक्स पहनने को मिले। इसके बाद हिमा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

गुरुवार को हिमा ने अंडर-20 वर्ल्ड ऐथलेटिक्स चैंपियनशिप की 400 मीटर दौड़ में गोल्ड मेडल अपने नाम किया। खास बात यह कि इस दौड़ के 35वें सेकंड तक हिमा टॉप थ्री में भी नहीं थीं, लेकिन बाद में ऐसी रफ्तार पकड़ी कि सभी को पीछे छोड़ दिया। जब राष्ट्रगान बजा तो हिना की आंखों से आंसू छलक पड़े।

देखें, हिमा ने ऐसे बनाया रेकॉर्ड

दो बीघा जमीन

हिमा का जन्म असम के नौगांव जिले के एक छोटे से गांव कांदुलिमारी के किसान परिवार में हुआ। पिता रंजीत दास के पास महज दो बीघा जमीन है जबकि मां जुनाली घरेलू महिला हैं। जमीन का यह छोटा-सा टुकड़ा ही दास परिवार के छह सदस्यों की रोजी-रोटी का जरिया है।

जीतकर यह बोलीं

‘मैं अपने परिवार की हालत जानती हूं कि हमने किस तरह से संघर्ष किए हैं। लेकिन ईश्वर के पास सभी के लिए कुछ न कुछ होता है। मैं पॉजिटिव सोच रखती हूं और जिंदगी में आगे के बारे में सोचती हूं। मैं अपने माता-पिता और देश के लिए कुछ करना चाहती हूं। मेरा अब तक सफर एक सपने की तरह रहा है। मैं अब वर्ल्ड जूनियर चैंपियन हूं।’

यह भी पढ़ें: हिमा की अंग्रेजी का मजाक उड़ाने पर एएफआई ने मांगी माफी

फिनलैंड में आईएएएफ वर्ल्ड अंडर-20 ऐथलेटिक्स चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर देश के लिए इतिहास रचने वाली 18 साल की हिमा दास ने इन्हीं शब्दों के साथ अपनी खुशी बयां की। वह महिला और पुरुष दोनों ही वर्गों में ट्रैक इवेंट में गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली भारतीय भी बन गई हैं। वह अब नीरज चोपड़ा के क्लब में शामिल हो गई हैं, जिन्होंने 2016 में पोलैंड में आईएएएफ वर्ल्ड अंडर-20 चैंपियनशिप में जैवलिन थ्रो में गोल्ड मेडल जीता था।

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SunnyJuly 12, 2018
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Companies are increasingly launching digital initiatives to expand or build digital capabilities to deliver business efficiency or top-line revenue growth. And as digital transformation success stories emerge, the trend is gaining steam.

IDC estimates that 40 percent of all technology spending will go toward digital transformations, with enterprises spending in excess of $2 trillion by 2019. 

The stakes are high. Leading digital companies generate better gross margins, better earnings and better net income than organizations in the bottom quarter of digital adopters, according to Harvard Business School. Leaders post a three-year average gross margin of 55 percent, compared to just 37 percent for digital laggards.

CIOs tackle change management and other challenges as they scale digital across the enterprise. In a sign of how hard change is, 78 percent of nearly 4,000 CIOs worldwide say their digital strategy is moderately effective or worse, suggesting such efforts remain in their infancy, according to the 2018 KPMG Harvey Nash CIO survey. Moreover, only 32 percent of those IT leaders say their digital strategy spans the enterprise, with most of the investment focused on the front-end, rather than on deeper operational capabilities.

Capgemini and MIT arrived at similar conclusions in recent research surveying more than 1,300 executives in over 750 global organizations.

“While we see progress on customer experience, organizations have not kept pace on building the necessary capabilities in operations, IT-business relationships, vision, engagement, and governance,” according to the July 3 report. Today, many organizations face the realities of the complexities of their journeys and realize just how challenging successfully transforming can be.”

Enterprises, Capgemini and MIT say, have not moved forward fast enough. CIO.com offers some snapshots of outliers who are seeing success as they embrace digital.

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SunnyJuly 8, 2018
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दिल की सुनो और आगे बढ़ते रहो…एक दिन कामयाबी जरूर हासिल होगी। जी हैं इस शख्स ने ऐसा ही किया। साल 2002 में नौकरी छोड़कर इस शख्स ने अपनी कंपनी की शुरुआत की और आज 6000 करोड़ रुपये से ज्यादा के मालिक बन गए हैं। ये शख्स और कोई नहीं बल्कि पटू केशवानी हैं जो कि देश के मशहूर होटल चेन 'लेमन ट्री' के मालिक हैं। लेमन ट्री के 2-4 स्टार होटल हैं। पटू केशवानी के सफलता की कहानी आपको जिंदगी की राह पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती रहेगी।

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SunnyJuly 7, 2018
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उम्र 15 साल और ये लड़की बिना किसी हिचकिचाहट के वो काम करती है, जिसे करने में अच्छो-अच्छों को शर्म आ जाएं या करने की हिम्मत ही न पड़े। काम के बारे में जानेंगे तो इसके जज्बे को सलाम करेंगे।

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SunnyJuly 6, 2018
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मुकेश हिंगड़/उदयपुर. यूं ही नहीं मिलती राही को मंजिल, एक जुनून सा दिल में जगाना होता है..। तमाम चुनौतियों और विपरीत परिस्थितियों को झुकाकर अपनी मंजिल पर सफलता का झंडा फहराने वाले ऐसे ही शख्स हैं, उदयपुर नगर निगम के कमिश्नर और स्मार्ट सिटी सीईओ सिद्धार्थ सिहाग। इनकी पढाई और फिर आईएएस तक का सफर युवाओं के लिए प्रेरणादायक है। इनकी मंजिल थी कि मैं आईएएस ऑफिसर बनकर समाज की सेवा करूं। इस पथ के सफर से पहले इन्हें न्यायिक सेवा का रास्ता मिला और फिर पुलिस सेवा में आए लेकिन मंजिल तो भारतीय प्रशासनिक सेवा ही थी, यही जुनून था। फिर क्या बिना कोचिंग सफलता की साधना पूरी मेहनत से की और आज परिणाम हमारे सामने हैं। किस तरह सिद्धार्थ सिहाग पहले जज और फिर पुलिस अधिकारी बने और कैसे उन्होंने आईएएएस परीक्षा उत्तीर्ण की, उन्हीं की जुबानी।

टारगेट और हार्डवर्क के साथ जरूर मिलेगी सक्सेस
‘अगर आप टारगेट और हार्डवर्क के साथ पढ़ाई-लिखाई करते हैं तो आप कभी पीछे रहने वाले नहीं हैं, आप चाहे जो सोच लें वह सक्सेस आपको जरूर मिलेगी। कॉलेज में आने के बाद ठाना था कि प्रशासनिक अधिकारी ही बनना है, इसके लिए बहुत मेहनत की। मैं स्कूलिंग के बाद पंचकुला से सीधे हैदराबाद गया। देहली ज्यूडिशियल सर्विस परीक्षा पास करने के बाद देहली के सिविल जज मेट्रोपोलियन मजिस्ट्रेट पर चयन हो गया। ट्रेनिंग कर ही रहा था कि आईएएस का परिणाम आ गया और 148वीं रैंक मिली। मुझे ऐसे में आईपीएस कैडर मिला और मैं नेशनल पुलिस एकेडमी हैदराबाद गया। आईपीएस की ट्रेनिंग के साथ ही आईएएस बनने का सपना नहीं छोड़ा और उसकी तैयारी भी जारी रखी। आईएएस की परीक्षा पूरी तैयारी के साथ दी और मुझे 148 से सीधे 42वीं रैंक मिली। इसके लिए मैंने कोई कोचिंग नहीं की। अलबत्ता 10 घंटे नियमित रूप से पढ़ाई जरूर की। तीनों ही कॉम्पीटिशन के लिए कोचिंग नहीं की। आईएएस की तैयारी के दौरान इंटरनेट से पुराने आईएएस के अनुभव जरूर लिए। वर्धा के तत्कालीन कलक्टर के ब्लॉग से भी नोट मददगार रहे और बाकी पूरा फोकस पढ़ाई पर। उस समय दो ऑप्शनल पेपर होते थे और तब भी बहुत टफ पेपर होते थे। आज के दौर में सामान्य ज्ञान पर पूरा फोकस होना चाहिए। ’

READ MORE : Good News : देश के टॉप 10 हॉलीडे डेस्टिनेशंस में उदयपुर, राजस्थान के ये 2 शहर भी हैं शुमार

एक परिचय सिहाग का

हरियाणा के हिसार के छोटे से गांव सिवानी बोलान के है और उनकी पूरी पढ़ाई पंचकुला में ही हुई है। सिहाग की पत्नी रूकमणि सिहाग भी आईएएस है और वर्तमान में डूंगरपुर में जिला परिषद सीईओ है। सिद्धार्थ के पिता दिलबाग सिंह हरियाणा में चीफ टाउन प्लानर के पद से रिटायर्ड हुए तो उनका भाई सिद्धांत दिल्ली में पिछले वर्ष ही जज बना है।

आप कॉम्पीटिशन दे रहे हैं तो सिद्धार्थ के टिप्स

– मॉक इंटरव्यू जरूर साझा करें।
– जीके से अपडेट रहें

– आंसर को बैलेंस रखे
– आत्मविश्वास कभी नहीं खोएं

– अफवाहों से दूर रहे
– अपनी कैपेबिलिटी पर भरोसा रखे

– दो साल तैयारी करें, फिर अटेम्प्ट देंगे ऐसा नहीं करें
– हर अटेम्प्ट जरूर दें

– इन्टरनेट से भी अपडेट रहे
– नियमित पढ़ाई का तय शिड्यूल रखें

डाउनलोड करें पत्रिका मोबाइल Android App: https://goo.gl/jVBuzO | iOS App : https://goo.gl/Fh6jyB

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SunnyJuly 5, 2018
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Arushi Chowdhury Khanna founded LoomKatha to connect rural artisans and handloom weavers with the global market, enabling greater economic value of the end-product to be transferred to the producer.

Arushi Chowdhury Khanna – Founder of LoomKatha

When Arushi Chowdhury Khanna was looking to employ indigenous artisans for her startup, LoomKatha, she zeroed in on Churu district in Rajasthan. The place is well-known for its bandhani (tie and dye) craft, mostly practised by women.

“There is a misconception that women need to be given a home-based activity because, as they say, khaana banana hai, bachche dekhne hai (need to cook and look after the children). But when we arranged for training of the women at a centre, in just two days, they brought their entire family along to show them that it was their ‘office’. If you give women the space and opportunity, they will work their lives around it. Contrary to preconceived notions, rural women are happy to leave the confines of their homes,” Arushi says.

The bandhani tradition was proving uneconomical because of the “bleed” factor and artisans were earning only around Rs 80-90 per day. It’s here that LoomKatha stepped in to work on the dyeing aspect. It fashioned a range of products with bandhani that could be put in a washing machine and not even bleed a jot. LoomKatha took these to a design fiesta in Tokyo, and the rest, as they say, is history.

Women at work on bandhani

LoomKatha, founded in 2016, aims to connect rural artisans and handloom weavers to the global market, enabling greater economic value of the end-product to be transferred to the producer.

After completing her studies at National Institute of Fashion Technology in Mumbai, Arushi had an option to choose between interning at Raymond’s or spending three months in Surendranagar, Gujarat with a group of weavers. “I chose three months with weavers over being boxed in a corporate entity. I did my thesis around market linkages to rural weavers in Gujarat and, with this, began my lifelong love affair with weaving and Indian textiles,” she says.

After completing her education, she worked with Women Weave in Madhya Pradesh and followed it up with stints in both profits and non-profits.

With LoomKatha, Arushi wanted to concentrate on small clusters of excellence in craftsmanship with sustainable long-term linkages.

Shibori jacket from LoomKatha

So, with Rs 75,000 and an Acumen Fellowship, she took the plunge. Her first batch of products were sourced from Churu, and after a year of trial and error and piloting, LoomKatha has a strong business model in place. Apart from participating at exhibitions around the world, it also sells women’s apparel, stoles, scarves and dupattas through its website. “We are looking at growing this channel as it gives us the highest profit margin, which we can then plough back into the artisans working with us,” she says.

LoomKatha is also active in Maheshwar, a town in Madhya Pradesh known for its sarees. The price point for its products ranges between Rs 999 and Rs 3,000. “We are looking at an efficient production process where we source the fabric from Maheshwar and get it dyed in Churu. So the cost as compared to other brands in the same segment is lower because we ensure an efficient production process,” explains Arushi.

In April 2017, Acumen organised a global competition for all their Fellows across the world. LoomKatha was one of the winners and received a research grant of $10,000 from San Francisco-based philanthropist Asha Jadeja. This has made it cash positive.

In line with its vision of reviving Indian craft, LoomKatha is now setting its sights on Aurangabad and the lost art of Himroo weaving. “It’s a Persian craft which was used for weaving shawls for the Nizam of Hyderabad. There are only two to three Himroo weavers in Aurangabad. The motifs have been misused by the power looms on cheap fabric, and that really killed the original craft. Soon, we will be taking steps to revive the art, and our first buyer is a large corporate organisation in the city itself. This will create a circular linkage within the city,” Arushi adds.

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