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SunnyNovember 13, 2018
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Lloyd’s has approved the 2019 business plan of Arcus 1856 syndicate with an increase in property insurance capacity.

The business plan sees Arcus 1856 maintain its focus on all current business lines across the syndicate’s property and specialty portfolio. In addition, there will be an increase in capacity for property insurance.

Lloyd’s of London has been taking action to reduce the market’s exposure to unprofitable lines and the size of the worst-performing syndicates.

Syndicates have been asked to conduct in-depth reviews of the worst-performing 10 percent of their portfolios along with all loss-making lines and have been submitting their relevant remediation plan for approval as part of the 2019 business planning process.

“Arcus 1856 operates a well-diversified portfolio of business and in 2019 our aim will be to ensure the ongoing profitability of that portfolio by maintaining strict underwriting discipline across all lines of business,” said Adrian Gfeller, managing director, Arcus 1856.

Arcus 1856 is 100 percent backed by funds managed by the Credit Suisse ILS division.

Managed by Barbican Managing Agency Limited, part of Barbican Insurance Group, Arcus 1856 has a 2018 stamp capacity of £104.2 million.

Focusing primarily on providing reinsurance solutions, the company operates a portfolio across property reinsurance and speciality lines, including energy, cyber, space and aviation, on a proportional, risk XL and Cat XL basis, with the ability to offer innovative ILS solutions.

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SunnyNovember 12, 2018
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अलीबाबा के जैक मा की कहानी भी गजब की है. वो ऐसे जीवट के शख्स थे, जिसे हर जगह नाकामी मिली थी. जिस नौकरी में वो इंटरव्यू देने जाते थे, उसमें उन्हें रिजेक्ट कर दिया जाता था. 10 सितंबर 2019 को जैक मा अलीबाबा से रिटायरमेंट ले लेंगे. इसके बाद वो टीचिंग करना चाहते हैं. उनकी भूमिका कंपनी में संस्थापकों के ग्रुप और बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स तक सीमित हो जाएगी.

आइए जानते हैं जैक मा के बारे में खास बातें

1. जैक मा ने 30 जगह नौकरी के लिए अावेदन भेजा था. उन्हें हर जगह से खारिज कर दिया गया था.

2. चीन में केएफसी की एक ब्रांच खुलने वाली थी. उसमें 24 लोग इंटरव्यू देने गए. 23 लोगों को सलेक्ट कर लिया गया. अकेले केवल जैक माम का चयन नहीं हुआ.3. उन्होंने एक दो बार नहीं बल्कि 10 बार हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में दाखिले के लिए अावेदन किया. वो हमेशा खारिज कर दिये गए.

4. जैक के तीन बच्चे हैं लेकिन कोई भी उनकी कंपनी में नहीं है.

5. जैक मा हमेशा कहते हैं कि इंटैलीजेंट लोगों को एक औसत लीडर की जरूरत होती है. बस जरूरत पर्सपेक्टिव की है, अगर आप अलग पर्सपेक्टिव में चीजें देंगे तो सफलता की संभावना भी ज्यादा रहेगी.

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जैक मा की फाइल फोटो- AP

6. मा उस चीन में अंग्रेजी के टीचर बने, जहां बहुत कम लोग इस भाषा को बोलते हैं और जानते हैं. उनका शुरुआती दौर बहुत संघर्ष वाला था. उनके शहर में गोंगझोऊ के होटलों में अक्सर अंग्रेज टूरिस्ट आते थे. जैक मा कोशिश करते थे कि वो उनके गाइड बन जाएं. इसके लिए वो रोज साइकल लेकर 70 मील की यात्रा करते थे. इन टूरिस्टों के संपर्क में आने से उन्हें अंग्रेजी सीखने में बहुत मदद मिली.

7. अलीबाबा का कारोबार 18 लोगों ने मिलकर एक छोटे से अपार्टमेंट से शुरू किया था. तब उनके पास ज्यादा रेवेन्यू नहीं था, लेकिन जैक मा को उम्मीद थी कि इंटरनेट आधारित सामानों को बेचने का बिजनेस जरूर चलेगा. और साहस देखिए, जिस समय उन्होंने अपना ईबिजनेस शुरू किया, तब चीन में बमुश्किल एक फीसदी लोगों के पास ही इंटरनेट की पहुंच थी. अगले 20 सालों में उनकी कंपनी चीन की सबसे बड़ी कंपनियों में ही शामिल नहीं हुई बल्कि अमेजन को भी टक्कर देने के करीब पहुंच गई.

8. शुरुआत में जापान के साफ्टबैंक ने उनके अलीबाबा में स्टार्टअप में 20 बिलियन डॉलर का निवेश किया. साफ्टबैंक के मालिक का कहना है कि जब इस बारे में उनकी जैक मा से मुलाकात हुई तो उनके पास ना तो कोई बिजनेस प्लान था और ना ही कोई रेवेन्यु. लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इस कंपनी में पैसा केवल इसलिए लगाया, क्योंकि उन्हें मा की आंखों में गजब का आत्मविश्वास नजर आया था. वो अपनी बातें बहुत अधिकार से कर रहे थे.

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जैक मा गरीब परिवार में पैदा हुए. उन्होंने चीन में तब इंटरनेट के जरिए ई कामर्स बिजनेस के बारे में सोचा जब वहां नेट मुश्किल से एक फीसदी लोगों के पास था

9. जैक मा जिस तरह का कारोबार चीन में शुरू किया, वो वाकई अलग किस्म का था, लेकिन जिस तरह उन्होंने इसे चलाया और फैलाया, उससे वो एशिया के सबसे धनी शख्स बन गए. वो फिलहाल 40 बिलियन डॉलर की निजी संपत्ति के मालिक हैं. नई तकनीक के सहारे बिजनेस चलाने के मामले में वो चीन में उदाहरण बन चुके हैं. चीन में कोई भी स्टार्टअप जब शुरू होता है, तो वो हमेशा मा उनके हीरो होते हैं.

10. जैक मा कम्युनिस्ट पार्टी के कट्टर समर्थक हैं. मीडिया पर नियंत्रण के पैरोकार हैं. उनका कहना है कि चीन का वन पार्टी रूल ही दरअसल इस देश की तरक्की की वजह है.

11. उनके अलीबाबा की टॉप पोजिशन छोड़ने पर ये सवाल जरूर उठाया जा रहा है कि क्या चीन नया जैक मा पैदा कर सकेगा. आप समझ सकते हैं कि चीन में वो एक किवंदति में बदल चुके हैं. अलीबाबा के प्लेटफार्म के जरिए एक नहीं सैकड़ों छोटे बिजनेस आगे बढ़े और फले फूले.

12. वर्ष 1999 में अलीबाबा शुरू करने वाले जैक ना तो टेक सेवी हैं और ना ही खुद को बहुत स्मार्ट मानते हैं लेकिन वो ऐसे शख्स जरूर हैं, जिन्होंने चीन के गांवों तक अलीबाबा का सामान बेचा. इसके बाद अपने बिजनेस का विस्तार आर्टिफिशियल इंटैलीजेंस, हेल्थकेयर और हॉलीवुड तक किया.

अलीबाबा की 18वीं वर्षगांठ के सेलिब्रेशन इवेंट के दौरान 40 हजार एम्पलाइज के सामने जैक मा ने माइकल जैक्सन की तरह एंट्री की.

13. जैक मा को करिश्माई लीडर कहा जाता है. वो आफिस की मीटिंग्स और प्रोग्राम्स में गाते और नाचते हुए भी देखे गए हैं.

कौन होगा जैक मा का उत्तराधिकारी

1. जैक मा की जगह जो शख्स इस कंपनी के सर्वेसर्वा होंगे, वो डेनियल झांग हैं. वो फिलहाल अलीबाबा के सीईओ हैं. अलीबाबा में पिछले एक दशक से जैक मा के उत्तराधिकारी को तैयार करने की तैयारी चल रही थी.

डेनियल झांग अब अलीबाबा की कमान संभालेंगे

2. झांग 46 साल के हैं. वो इस कंपनी में 11 साल पहले जुड़े थे. अलीबाबा आज जिस स्थिति में है, उसमें उनकी भूमिका पिछले कुछ सालों में खासी अहम रही है. कंपनी उन्हें ना केवल क्रिएटिव मानती है बल्कि ये भी देखती है कि उनके पास गजब का विजन है. कंपनी के एग्जीक्यूटिव वाइस चेयरमैन जो त्साई कहते हैं कि वो सक्षम हैं कि ये बड़ी जिम्मेदारी संभाल सकें.

3. 11-11 का आइडिया झांग का ही था, जब कंपनी ने पिछले साल 11 नवंबर को एक ही दिन में 25 बिलियन डॉलर का बिजनेस किया. ये एक ऐसा प्रयोग था, जिसने अलीबाबा का बहुत कुछ बदलकर रख दिया. इतने बड़े पैमाने पर दुनिया में एक दिन में बिक्री का ये नया रिकॉर्ड था. ये इतना आसान नहीं था, क्योंकि इसके लिए आपकी पूरी मशीनरी और इसके हर हिस्से को तैयार रहना था. ये पूरा अभियान लगातार 24 घंटे तक बहुत सहजता से चलता रहा.

4. वो शंघाई यूनिवर्सिटी में फाइनेंस और इकोनॉमिक्स के ग्रेजुएट हैं. झांग अलीबाबा में आने से पहले कई नामी कंपनियों में काम कर चुके हैं, जिसमें प्राइस हाउस वाटरकूपर्स शामिल है. वो एक ऐसी चाइनीज कंपनी में भी काम कर चुके हैं, वो आनलाइन गेमिंग में शामिल थी.

कई कंपनियों में काम करने के बाद झांग अलीबाबा पहुंचे और तरक्की की सीढियां चढ़ते गए

5. वर्ष 2007 में उन्होंने चीफ फाइनेंशियल अफसर के रूप में अलीबाबा ज्वाइन की. इसके बाद वो धीरे धीरे अलीबाबा में ऊपर की सीढियां चढ़ते चले गए.

6. हाल ही में झांग की रणनीति के चलते अलीबाबा को स्टारबक्श से कॉफी डिलिवर करने का आर्डर मिला है. इसके लिए उसे फूड आर्डर डिलिवरी कंपनी टेंसेंट से जबरदस्त चुनौती मिली, धीरे धीरे ये भी हो रहा है कि अलीबाबा अपने को अलग प्लेटफार्म्स में फैला रही है.

7. कहा जा सकता है कि हाल के बरसों में अलीबाबा का एंपायर जिस तरह समूचा बदल गया या सुपरचार्ज हो गया, उसमें झांग की भूमिका खासी अहम रही है.

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SunnyNovember 12, 2018
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नई दिल्ली

होमलोन रीपेमेंट ऑप्शन के बारे में जानकारी बहुत जरूरी है। इसका एक सीधा फायदा यह है कि आपको बचत के बारे में पता चलेगा। आप सही निर्णय पर बेझिझक पहुंच पाएंगे। वैसे कोई भी निर्णय लेने से पहले आप अपनी सुविधा और पॉकेट का जरूर ध्यान रखें।

स्टेप-अप रीपेमेंट-लोन प्लान

जो लोग करियर के शुरुआती दौर में होम लोन लेते हैं, उनके लिए स्टेप-अप रीपेमेंट-लोन प्लान एक बेहतर ऑप्शन है। इसमें रीपेमेंट सीधा बायर्स की आय से जुड़ा होता है। यह बायर्स को एक सामान्य हाउसिंग लोन की अपेक्षा कहीं अधिक लाभ पहुंचाता है। इस स्किम के बारे में फाइनैंशल अडवाइजर की मानें तो यह योजना उनके लिए अधिक फायदेमंद है, जो कम उम्र में ही अपना घर खरीद लेते हैं। इसके पीछे तर्क देते हुए कहते हैं कि एक बार आय बढ़ जाने के बाद हर कोई अपने करियर में आगे की सोचता है। सच तो यह है कि ईएमआई के भुगतान की फिक्र लोगों को शुरुआती दिनों में ही होती है। एक समय के बाद वह अपनी सुविधानुसार लोन एडजस्ट कर लेता है और ईएमआई बढ़ जाने के बाद भी टैक्स बचत का फायदा उठाता है।


स्टेप-डाउन रीपेमेंट प्लान


स्टेप डाउन रीपेमेंट प्लान, पहले के ठीक उल्टा है। इसमें शुरुआती दिनों में ईएमआई ज्यादा होती है और बाद के वर्षों में यह घटते जाती है। यह प्लान उन्हें ध्यान में रखकर बनाया गया है जो जॉब के आखिरी दिनों में लोन लेते हैं।

फिक्स-फ्लेक्सिबल इंस्टॉलमेंट

फिक्स रीपेमेंट प्लान में ईएमआई एक निश्चित समय के लिए फिक्स होगी और इसके बाद यह मार्केट रेट के हिसाब से अजस्ट हो जाएगी। फिक्स्ड टाइम के दौरान ईएमआई मार्केट से प्रभावित नहीं होगी। यह बायर्स के लिए उस समय फायदेमंद है, जब ब्याज दर के बढ़ने की उम्मीद सबसे ज्यादा हो। हालांकि इस योजना को लेते समय काफी सतर्क रहना होता है, क्योंकि लेंडर एग्रीमेंट के दौरान फिक्स्ड राशि में वृद्धि का प्रावधान कर देते हैं। फ्लेक्सिबल लोन इंस्टॉलमेंट ठीक इसके विपरीत है। इस प्लान के भी शुरुआती वर्षों में ईएमआई ज्यादा होती है, लेकिन रीपेमेंट के आखिरी दिनों में यह धीरे धीरे घटती जाती है। यह उन परिवारों को ध्यान में रखकर बनाई गई है, जो अपने बच्चों के लिए घर खरीदना चाहते हैं। इसमें लोन को इस तरीके से प्लान किया जा सकता है कि रिटायरमेंट के बाद जब कोई इसे भुगतान करने की स्थिती में न हो, तो बाकि बची रकम उनके बच्चे चुका सकें।


ट्रैंच बेस्ड रीपेमेंट प्लान


अमूमन बायर्स को अपना होम लोन अमाउंट पर ब्याज, कंस्ट्रक्शन के पूरा होने तक विभिन्न फेज के हिसाब से देना होते हैं। हालांकि, इस तरह का प्लान बहुत कम बैंकों द्वारा ऑफर किया जाता है, जो बायर्स को ब्याज की राशि बचाने में मदद करे। इसमें बायर्स अपनी आय के हिसाब से एक निश्चित राशि तय कर सकते हैं जो प्रॉपर्टी पर कब्जा करने से पहले वे बैंक को किस्तों में दे सकें। इसकी मदद से बायर्स लोन जल्दी चुका कर अपना समय और धन बचा सकते हैं। यह प्लान उनके लिए बेहतर है, जो अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी खरीदते हैं।

एक्सेलरेटेड रीपेमेंट प्लान

इस प्लान में बायर्स अपनी आय के हिसाब से ईएमआई की राशि में वृद्धि कर सकते हैं। इसी में एक लम्प-सम का भी ऑप्सन होता है, जो सबसे ज्यादा चुना जाता है। यह लोन को तेजी से रीपेमेंट करने और साथ ही टैक्स को बचाने में भी मदद करता है।

बलून रीपेमेंट प्लान

यह प्लान भी हू-ब-हू स्टेप-अप प्लान की तरह ही है। लेकिन इस प्लान में लोन के शुरुआती दिनों में इंस्टॉलमेंट की राशि छोटी भी रख सकते हैं। नाम के अनुसार ही बाद के दिनों में इंस्टॉलमेंट की राशि धीरे-धीरे बढ़ने लगती है। किसी प्लान को चुनने से पहले उस प्लान के बारे में अत्यंत बारीकी से जान लेना जरूरी है। ताकि आगे जाकर आपको किसी भी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़े। एक्सपर्ट्स के अनुसार किसी भी प्लान को चुनने से पहले सबसे महत्वपूर्ण कार्य यह है कि आपने जो लोन चुकाने के लिए प्लान चुना है, उसके सभी क्लाउज को ध्यान से पढ़ें। जिस कंपनी से आप लोन ले रहे हैं उसके पुराने कस्टमर्स से संभव हो तो मिलें। ताकि आपको अपने लेंडर के बारे में, उसकी पॉलिसी के बारे में समुचित जानकारी मिल जाए।

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SunnyNovember 12, 2018
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When was the last time you switched companies? Have you been through a recent merger or acquisition? Are you thinking about moving companies or growing a team?

How does such monumental change impact you as an agent and leader in the real estate industry today?

The fact is this; taking control of your brand and digital presence is the key to securing a career legacy.

Smart agents are focusing on “name recognition” — with amazing results. Name recognition keeps the momentum flowing in your business, no matter the distractions or challenges you may face in the future.

Your brand is YOU. And it’s time to own it.

Not sure where to start? Here are a few pointers.

Build name recognition with an amazing website

The number one tool that represents you online, 24/7, is your website. Not your Facebook page, your Twitter feed, or your Instagram profile.

Having a website sets you apart. Having a creatively designed, lead-generating site is what takes you from average to next level in your career.

Now is the time to show everyone who and what you are: an authentic, genuine, professional, and passionate lifetime real estate advisor. The sky’s the limit in style, function, and content that enhances your brand.

Remember: consumers crave relationships with real people, not brands.

Drive high-quality marketing leads directly to you, from anywhere

Social media, home search portals, and pay-per-click advertising have created more places to openly market listings at the top of the marketing funnel. As an agent, you should diversify your lead generation by taking advantage of as many of these platforms as possible.

But no matter which platforms you choose, a robust website is ultimately “the hub” that will drive qualified buyers and sellers directly to you.

It’s the conversion point from consumer to client.

A high-converting website is the key to developing a powerful lead-gen pipeline. And with that pipeline, you can grow your career without relying on any specific third-party platform.

Create a 24/7 marketing engine powered by YOU.

Beautifully market your listings and communities to attract more sellers

If social media is your only branding platform, you are not showcasing how you market homes, know your communities, and negotiate for your buyers and sellers.

Consumers demand to know more and want to see more than in the past. They need to see you are marketing and technology savvy.

So blow them away with a stunning online listings platform and expertly crafted, hyperlocal community guides. Use high-quality photos, videos, and storytelling to position yourself as the true local expert you are.

Get your own branded app

As the world moves to mobile, a branded mobile home search app is an innovative way to differentiate yourself from your competition, above and beyond your website.

Research indicates mobile apps drive client engagement and increase brand loyalty.

And what better way to stay top of mind with your clients than to have your app’s icon—with your branding—sitting permanently on their phone’s home screen?
How will you take control of your brand in 2019?

2019 is right around the corner, and it’s time for peak performance on the web.

Need to establish your online brand? Real Estate Webmasters is here to help.


About Real Estate Webmasters

Innovative web and app design. Exceptional SEM capabilities. High-performance CRM. That’s how Real Estate Webmasters helps our clients generate the leads that convert into sales. And the results are nothing short of amazing. Come join the 60,000 other top real estate professionals in North America who have found success with Real Estate Webmasters.

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SunnyNovember 12, 2018
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ऑइल मिनिस्ट्री के इस प्लान के खिलाफ है ओएनजीसी

– डिस्कवर्ड स्मॉल फील्ड (DSF) बिड राउंड के दायरे में ओएनजीसी के खोजे गए और उत्पादन वाले क्षेत्रों की नीलामी उन कंपनियों के बीच कराई जा सकती है, जो सरकार को उत्पादन का अधिकतम हिस्सा दें

– ओएनजीसी का मानना है कि उसे भी उन शर्तों पर काम करने की इजाजत मिलनी चाहिए, जिन्हें सरकार डीएसएफ के तहत प्राइवेट और विदेशी कंपनियों के सामने रख रही है

पीटीआई, नई दिल्ली

सरकार ओएनजीसी के 149 छोटे तेल एवं गैस क्षेत्रों को प्राइवेट और विदेशी कंपनियों को बेचने पर विचार कर रही है। सूत्रों ने यह भी बताया कि सरकार ओएनजीसी को केवल बड़े क्षेत्रों पर फोकस करने की इजाजत देने पर विचार कर रही है।

सूत्रों ने बताया कि इसके तहत डिस्कवर्ड स्मॉल फील्ड (DSF) बिड राउंड के दायरे में ओएनजीसी के खोजे गए और उत्पादन वाले क्षेत्रों की नीलामी उन कंपनियों के बीच कराई जा सकती है, जो सरकार को उत्पादन का अधिकतम हिस्सा दें।

ओएनजीसी की कुछ फील्ड्स को प्राइवेट और विदेशी कंपनियों को देने की ऑयल मिनिस्ट्री की यह दूसरी कोशिश है। पिछले साल अक्टूबर में डायरेक्टरेट जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बंस ने सरकारी तेल कंपनियों के उत्पादन वाले 15 क्षेत्रों का चयन किया था, जहां कुल 79.12 करोड़ टन क्रूड ऑयल और 333.46 बिलियन क्यूबिक मीटर गैस है। डीजीएच इन क्षेत्रों को इस उम्मीद में प्राइवेट कंपनियों को देना चाहता था कि वे बेसलाइन एस्टिमेट और वहां से उत्पादन में बढ़ोतरी कर पाएंगी।

हालांकि इस योजना पर कदम नहीं बढ़ाए जा सके क्योंकि ओएनजीसी ने डीजीएच के प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया और यह सुझाव दिया था कि सरकार ने प्राइवेट कंपनियों के लिए जो योजना बनाई है, उन्हीं शर्तों पर उसे कामकाज करने की इजाजत दी जाए।

सूत्रों ने बताया कि मौजूदा योजना 12 अक्टूबर की उस बैठक के बाद बनाई गई है, जिसे पीएम नरेंद्र मोदी ने बुलाया था। वह बैठक ऑयल और गैस के भारतीय उत्पादन की समीक्षा करने और साल 2022 तक आयात पर निर्भरता मे 10 प्रतिशत कमी करने का रोडमैप तैयार करने के लिए बुलाई गई थी।

एक मीटिंग में मंत्रालय ने प्रेजेंटेशन दिया जिसमें दिखाया गया कि ओएनजीसी का 95 प्रतिशत उत्पादन 60 बड़ी फील्ड्स से आता है और 149 छोटी फील्ड्स से उत्पादन का योगदान महज 5 प्रतिशत है। उस मीटिंग में यह सुझाव दिया गया था कि छोटी फील्ड्स प्राइवेट और विदेशी कंपनियों को दी जा सकती हैं और ओएनजीसी बड़ी फील्ड्स पर ध्यान केंद्रित कर सकती है, जहां वह अपनी टेक्नोलॉजी पार्टनर्स का सहयोग प्रॉडक्शन एनहांसमेंट कॉन्ट्रैक्ट्स या टेक्निकल सर्विस अरेंजमेंट्स के जरिए ले सकती है।

सूत्रों ने बताया कि उसके बाद नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत के तहत छह सदस्यों की एक कमेटी इस बारे में एक प्रस्ताव देने के लिए बनाई गई।

ओएनजीसी हालांकि इस प्लान के खिलाफ है। उसका मानना है कि उसे उन्हीं शर्तों पर काम करने की इजाजत मिलनी चाहिए, जिन्हें सरकार डीएसएफ के तहत प्राइवेट और विदेशी कंपनियों को दे रही है।

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SunnyNovember 12, 2018
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Publish Date:Mon, 12 Nov 2018 09:17 AM (IST)

नई दिल्ली (बिजनेस डेस्क)। अधिकांश उत्पादों में आमतौर पर ज्यादा से ज्यादा फीचर्स को अच्छा माना जाता है। फिर चाहे कार, मोबाइल फोन या मकान हो, ज्यादा फीचर होने से माना जाता है कि उत्पाद बेहतर होगा। लेकिन जब बात बचतकर्ताओं और निवेशकों के लिए वित्तीय उत्पादों की आती है तो फीचर्स के लिए आकर्षण समस्या पैदा करता है क्योंकि इससे उत्पाद में अस्पष्टता और पेचीदगी आने लगती है। समस्या उस समय और बढ़ जाती है जब ज्यादा से ज्यादा फीचर्स की बीमारी म्यूचुअल फंड एसआइपी (सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) जैसे वित्तीय उत्पादों में बढ़ती है। जब इन उत्पादों का अस्तित्व ही सरलता पर निर्भर करता है तो यह समस्या और गंभीर हो जाती है।

अत्यधिक पेचीदा विश्लेषण में उलझकर अहम बिंदुओं को नजरंदाज करना बहुत आसान होता है। कुछ हफ्तों पहले मुझे एक निवेशक से एक ईमेल मिला। उस व्यक्ति ने लिखा कि उसने कहीं एक लेख पढ़ा था कि अगर कोई मासिक एसआइपी की राशि हर साल दस फीसद बढ़ाता है तो मैच्योरिटी पर कुल रकम 45 फीसद बढ़ जाएगी। वह निवेशक जानना चाहता था कि क्या यह बात सही है और अगर ऐसा है तो क्या यह राशि हर साल सामान्य वृद्धि के साथ बढ़ाई जाए या फिर चक्रवृद्धि (कंपाउंडिंग) आधार पर बढ़ाई जाए। मैं इस मेल में पूछ गए सवाल के बारे में निश्चित नहीं हूं कि उत्तर क्या दिया जाए।

इस सवाल का एक अच्छा पहलू है कि जमाकर्ता निवेश को गंभीरता से लेते हैं और बारीकी से समझने का प्रयास करते हैं कि उन्हें क्या करना है। वे यह समझने के लिए उत्सुक हैं कि उसका असर क्या होगा। लेकिन इसके दूसरे पहलू में समस्या भी है क्योंकि निवेश को लेकर एक तरह की रूढ़िवादिता भी दिखाई देती है। कोई अपने इर्द-गिर्द पूरी स्थिति को समझे बगैर गणितीय कुशलता का अत्यधिक इस्तेमाल कर रहा है। इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए पहला तरीका है कि सीधे तौर पर गणित का सहारा लिया। सीधे गणना पर भी ध्यान न दिया जाए तो भी एक बात स्पष्ट है और कोई भी इससे इन्कार नहीं कर सकता है कि अगर आप ज्यादा निवेश करते हैं तो आपको ज्यादा फायदा होगा। लेख में भी इसी मूल सवाल को पाठकों को समझाने का प्रयास किया गया है।

लेकिन बड़ी समस्या वह सोच है कि किसी भी उथल-पुथल भरे असेट (म्यूचुअल फंड या कोई अन्य निवेश प्रपत्र) में ज्यादा निवेश करके कॉस्ट एवरेजिंग करने के अत्यंत सरल सिद्धांत को बड़ा चमत्कार मान लिया जाए। एसआइपी के पीछे भी यही सिद्धांत है कि बाजार की स्थितियों का अध्ययन किए बगैर आपको शेयर आधारित म्यूचुअल फंड स्कीम में निश्चित रकम नियमित रूप से निवेश करते रहना चाहिए। लंबी अवधि के बाद आप पाएंगे कि आपने बाजार में गिरावट के समय ज्यादा यूनिट खरीदीं। जबकि बाजार में तेजी के समय कम यूनिट खरीदी गईं। इससे आपकी औसत खरीद कीमत काफी कम होगी। इस तरह अपना निवेश बाजार से निकालते समय इस बात की ज्यादा संभावना है कि आपकी रकम काफी बढ़ चुकी होगी। हालांकि इसकी कोई गारंटी नहीं है। इसमें निश्चित रिटर्न की भी कोई उम्मीद नहीं है। कल्पना कीजिए, अगर शेयर बाजार लंबी अवधि में ज्यादातर समय स्थिर रहता है या गिरावट आती है, तो एसआइपी का यह सिद्धांत लागू नहीं होगा। लेकिन वास्तविक तौर पर होता यही है कि अगर बाजार में भारी उथल-पुथल रहती है और कुल मिलाकर वृद्धि का रुख रहता है तो लंबी अवधि में आप फायदा पाने में सफल होंगे।

लेकिन किसी एसआइपी की वैल्यू गणित नहीं है बल्कि यह मनोविज्ञान है। बाजार में कब निवेश करना है, कब नहीं करना है और सर्वोत्तम निवेश का अवसर गंवाने की चिंता किए बगैर शेयर बाजार से रिटर्न हासिल करने का सबसे अच्छा और सबसे आसान तरीका एसआइपी है। इसका गणित एकदम सरल है कि आप निश्चित रकम नियमित रूप से निवेश करें तो आपको फायदा मिलेगा। लेकिन म्यूचुअल फंड मार्केट निवेशकों को लुभाने के लिए खूबियों और फीचर्स का इस्तेमाल करता है और उन्हें कई विकल्प देने का प्रयास करता है। बाजार में ऐसे अनेक एसआइपी प्लान हैं जिनमें मार्केट टाइमिंग को फीचर के तौर पर जोड़ा गया है। कई म्यूचुअल फंड कंपनियां और सलाहकार हैं जो इंडेक्स लेवल या पीई या किसी अन्य आधार पर एसआइपी की राशि कम या ज्यादा करेंगे। यह दिलचस्प है कि एसआइपी में निवेश बाजार में समय का ख्याल किए बगैर किया जाता है। इसमें बाजार की उथल-पुथल के बाद कुल खरीद लागत स्वत: ही कम हो जाती है। ऐसे में किसी अन्य अतिरिक्त चाल की गुंजाइश ही नहीं रह जाती है।

अगर एसआइपी में निवेश की कोई टेक्निक हो सकती है तो वह इसे सबसे सरल बनाए रखना है। इसमें किसी भी तक की पेचीदगी नहीं होनी चाहिए, तभी उच्चतम वैल्यू मिल सकती है। यह एसआइपी है। दूसरे शब्दों में कहें तो एसआइपी में निवेश करें और शांति से रहें।

Posted By: Pramod Kumar

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SunnyNovember 11, 2018
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Ben Bierman is the managing director of Business Partner Limited.

JOHANNESBURG – 
Depending on their industry and core offering, businesses tend to experience one of two extremes over the festive season – a frantic hustle or a standstill.
With just under a month to go until December, this means that those in industries such as hospitality or retail should be gearing up for peak season, while manufacturers and builders, for example, are likely already beginning to wind down for the year. 
Regardless of which side of the fence a business falls on, the key to getting through the festive season for almost all entrepreneurs is simple: plan accordingly, with a particular focus on staffing, cash flow, stock, promotions and maintenance. 

When it comes to staffing, typical manufacturers need to ensure that their employees take leave over the festive season, as the business shuts down. Luckily for employers, because South African labour law allows them to determine the most appropriate time of the year for staff to take leave, this is mostly a straightforward process. 

The staffing challenges of retailers and businesses that need to ramp up for the festive season are of a different order altogether. Often, the difference between a good and a bad year hinges on four or five weeks of sales, which in turn may depend upon there being enough well-trained seasonal staff. 
From a cash flow perspective, the festive season is the most precarious time of the year for manufacturers and other businesses who all but shut down for the holidays. No new business will be coming in, while leave and bonus payments must be paid out. 

Hopefully
the sales from the year would have been adequate to tide the company over December and January, but the knock-on effect of the December shut-down can often have a sneaky way of catching up on a business in February. This is why it is essential to do careful cash-flow forecasts that project at least six months into the future so that finance applications can be done well in advance. 

Retailers tend to be at their busiest when things go according to plan over the festive season. The challenge to retail entrepreneurs is to exercise discipline by recognising that it represents a significant chunk of the business’s income for the whole year and that it needs to be preserved in order to tide the business over the quiet months. 
When it comes to stocking, manufacturers must try to move as much stock out of their warehouses as possible by shut-down, while retailers try to get their hands on as much of the right kind of stock as possible for the festive season promotions. 

Generally, these complementary needs of manufacturers and retailers work well. However, problems may arise for manufacturers with the logistics of getting increasing volumes of goods onto the retail shelves through increasingly congested traffic, especially around large shopping centres. Distribution planning needs to take into account these special conditions over the festive season. 

The promotional drive is more relevant for those gearing up for peak season, than those winding down. Retailers, for example, may be planning something for Black Friday, which is in the last week of November. 
On the other hand, for those winding down, the festive season is the ideal time to clean, service and maintain their plant and equipment. The key here is to schedule in timeous, preventative maintenance and – as with all aspects of the festive season – careful planning for the year ahead.

Ben Bierman is the managing director of Business Partner Limited.

The views expressed here are not necessarily those of Independent Media.
BUSINESS REPORT 

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SunnyNovember 11, 2018
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Space is corporate China’s newest frontier, as Chinese startups prepare to boldly go head-to-head with the likes of Elon Musk’s and Jeff Bezos’s Blue Origin LLC for a slice of the space market.

It is still a risky business that must overcome complex technical challenges, as a high-profile rocket-launch failure over northwest China showed in late October. But with about 80 commercial Chinese space-technology startups now operating and competition heating up, the breakthroughs are likely to soon outnumber the disappointments, analysts say.

“Three years ago, no one imagined that a private Chinese company could do this,” said Lan Tianyi, founder of Ultimate Blue Nebula Co., a Beijing consultancy, referring to the launch attempt. “Now, the private sector in China is very strong.”

China has ambitious plans for its national space program. Coming missions include the launch of an unmanned lunar lander in December, while a Mars lander is due to blast off in 2020. China’s BeiDou satellite navigation system—a rival to the U.S. Global Positioning System—is due for completion that same year.

Beijing opened up its space industry to private players in 2014, with the government hoping to snare a piece of the booming global commercial space sector.

That industry generated revenue of $348 billion last year, largely from building, launching and operating satellites, according to the Washington, D.C.-based Satellite Industry Association.

Most of the roughly 80 Chinese space startups counted by Mr. Lan are building satellites and related software applications, while as many as 10 are developing launch vehicles, hoping one day to rival existing state and private-sector launch outfits such as Space Exploration Technologies Corp.—as is formally known—for commercial contracts.

Landspace Technology Corp. had hoped to become the first Chinese startup to blast a into orbit last month. But its Vermillion Bird failed to achieve its mission of putting a satellite into orbit, opening the door for another launch developer, One Space, to achieve the milestone when it stages an orbital launch slated for late 2018. Should that attempt fail, further contenders are lining up launches in 2019.

Like other entrepreneurs with no background in aerospace, spotted a big opportunity in the government’s liberalization of the space industry.

Mr. Zhang, a former banker with Hongkong and Shanghai Banking Corp. and Santander Group , co-founded Landspace in 2015 with a team of experienced engineers who had worked on the Long March family that underpins China’s national space program. The team had no idea how to turn its knowledge into a commercial venture, Mr. Zhang said in an interview earlier this year.

The U.S’s fast-growing private space industry was the team’s source of inspiration. “We wanted to do something like SpaceX—they were our role model,” Mr. Zhang said.

Landspace has raised about $72 million from a combination of private investors and city governments, including the eastern city of Huzhou, where Landspace has a factory.

The state is involved in most of China’s commercial launch startups, if only as an investor. One Space, Landspace’s rival, raised its $116 million in funding from private investors and state-owned funds, a spokesman for the company said.

Landspace needs roughly a further $115 million in capital to reach the stage where it can start commercial operations, Mr. Zhang said. The rocket tested in October can only carry a 300-kilogram (660-pound) payload, but Landspace is developing a larger—and technically far more complex—vehicle that is designed to lift 4,000 kilograms and would put it within touching distance of SpaceX’s Falcon 9 rocket, which can handle 4,850 kilograms.

While says it costs $62 million to launch the Falcon 9, Mr. Zhang said clients would be able to lease Landspace’s rocket—which is designed to reach a lower orbit than the more powerful Falcon 9—for about $15 million.

China isn’t the only country with commercial space aspirations; Brazil, India, Japan and the United Arab Emirates are all vying for launch business, too. What’s more, China’s ability to tap the American market is hampered by a U.S. government policy that restricts China from launching satellites made with U.S. parts, effectively barring it from launching American and some other commercial satellites.

But that hasn’t stopped China’s state-run space agencies from winning European contracts, and the entry into the global satellite business by its private sector raises the prospect of cheaper launch costs, both for longtime customers such as telecommunications and media companies, as well as for emerging industries finding new ways to use the technology.

Many of China’s private satellite firms are developing CubeSats, miniaturized satellites that come relatively cheap, can be launched 20 at a time and can be deployed in large constellations to provide widespread coverage.

One such startup, Beijing-based ZeroG Labs, sells CubeSats for about $100,000, a fraction of the cost of a traditional satellite, said Zhang Bei, the company’s chief executive.

A former salesman with Cisco Systems Inc. and Symantec Corp. , Mr. Zhang marshaled a group of aerospace engineers to found the company last year.

ZeroG Labs, which raised about $3 million in its first investment earlier this year, already has three CubeSats in orbit, and plans to launch 132 more by 2022. The CubeSats’ remote sensing and Earth observation capabilities have big-data and artificial-intelligence applications for all kinds of companies, Mr. Zhang said, and can monitor things as diverse as forests, parking lots and shipping lanes.

One example cited by Mr. Lan, the consultant, is Chinese agri-tech startup Beijing Jiage Tiandi Technology Co., which provides a satellite-based crop-monitoring service, telling farmers where and when to irrigate, fertilize or harvest.

The cost-effective combination of CubeSats and commercial launches is “creating a completely new market” that will make space services far more accessible and attract global with no prior history of using satellites, Mr. Lan said.


Source: The Wall Street Journal

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SunnyNovember 11, 2018
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Rocket Lab’s Modest Launch Is Giant Leap for Small Rocket Business

The company’s Electron rocket carried a batch of small commercial satellites from a launchpad in New Zealand, a harbinger of a major transformation to the space business.

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Rocket Lab’s Electron launched from a site in New Zealand on Sunday, local time. The rocket carried seven payloads, all small satellites.CreditCreditRocket Lab
  • Nov. 10, 2018

A small rocket from a little-known company lifted off Sunday from the east coast of New Zealand, carrying a clutch of tiny satellites. That modest event — the first commercial launch by a U.S.-New Zealand company known as Rocket Lab — could mark the beginning of a new era in the space business, where countless small rockets pop off from spaceports around the world. This miniaturization of rockets and spacecraft places outer space within reach of a broader swath of the economy.

The rocket, called the Electron, is a mere sliver compared to the giant rockets that Elon Musk, of SpaceX, and Jeffrey P. Bezos, of Blue Origin, envisage using to send people into the solar system. It is just 56 feet tall and can carry only 500 pounds into space.

But Rocket Lab is aiming for markets closer to home.

“We’re FedEx,” said Peter Beck, the New Zealand-born founder and chief executive of Rocket Lab. “We’re a little man that delivers a parcel to your door.”

Behind Rocket Lab, a host of start-up companies are also jockeying to provide transportation to space for a growing number of small satellites. The payloads include constellations of telecommunications satellites that would provide the world with ubiquitous internet access.

The payload of this mission, which Rocket Lab whimsically named “It’s Business Time,” offered a glimpse of this future: two ship-tracking satellites for Spire Global; a small climate- and environment-monitoring satellite for GeoOptics; a small probe built by high school students in Irvine, Calif., and a demonstration version of a drag sail that would pull defunct satellites out of orbit.

Space Angels, a space-business investment firm, is tracking 150 small launch companies. Chad Anderson, Space Angel’s chief executive, said that although the vast majority of these companies will fail, a small group possess the financing and engineering wherewithal to get off the ground.

Each company on Mr. Anderson’s list proffers its own twist in business plan or capability:

  • Vector Launch Inc. aims for mass production;

  • Virgin Orbit, a piece of Richard Branson’s business empire, will drop its rockets from the bottom of a 747 at 35,000 feet up;

  • Relativity Space plans to 3-D print almost all pieces of its rockets;

  • Firefly Aerospace will offer a slightly larger rocket in a bet that the small satellites will grow a bit in size and weight;

  • Gilmour Space Technologies is a rare Australian aerospace company;

  • And Astra Space Inc., which is operating in stealth mode like a Silicon Valley start-up, saying nothing about what is doing.

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Daniel Bryce, a manufactering operations manager working on a satellite at Spire Global in Glasgow.CreditAndy Buchanan/Agence France-Presse — Getty Images

Rockets are shrinking, because satellites are shrinking.

In the past, hulking telecommunications satellites hovered 22,000 miles above the Equator in what is known as a geosynchronous orbit, where a satellite continuously remains over the same spot on Earth. Because sending a satellite, there was so expensive, it made sense to pack as much as possible into each one.

Advances in technology and computer chips have enabled smaller satellites to perform the same tasks as their predecessors. And constellations of hundreds or thousands of small satellites, orbiting at lower altitudes that are easier to reach, can mimic the capabilities once possible only from a fixed geosynchronous position.

“It’s really a shift in the market,” Mr. Beck said. “What once took the size of a car is now the size of a microwave oven, and with exactly the same kind of capabilities.”

Some companies already have launched swarms of satellites to make observations of Earth. Next up are the promised space-based internet systems such as OneWeb and SpaceX’s Starlink.

Until now, such small spacecraft typically hitched a rocket ride alongside a larger satellite. That trip is cheaper but inconvenient, because the schedule is set by the main customer. If the big satellite is delayed, the smaller ones stay on the ground, too. “You just can’t go to business like that,” Mr. Beck said.

The Electron, Mr. Beck said, is capable of lifting more than 60 percent of the spacecraft that headed to orbit last year. By contrast, space analysts wonder how much of a market exists for a behemoth like SpaceX’s Falcon Heavy, which had its first spectacular launch in February.

A Falcon Heavy can lift a payload 300 times heavier than a Rocket Lab Electron, but it costs $90 million compared to the Electron’s $5 million. Whereas SpaceX’s standard Falcon 9 rocket has no shortage of customers, the Heavy has only announced a half-dozen customers for the years to come.

The United States military — a primary customer for large launch vehicles — is also rethinking its spy satellites. The system would be more resilient, some analysts think, if its capabilities were spread among many, smaller satellites. Smaller satellites would be easier and quicker to replace, and an enemy would have a harder time destroying all of them.

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The Rocket Lab production facility. Its rockets cost $5 million.CreditRocket Lab
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A Rocket Lab Rutherford engine test.CreditRocket Lab
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An Electron “Still Testing” rocket with Shaun D’Mello, Rocket Lab’s vice president of launch.CreditRocket Lab

SpaceX could have cornered this market a decade ago.

Its first rocket, the Falcon 1, was designed to lift about 1,500 pounds. But after just two successful launches, SpaceX abandoned it, focusing on the much larger Falcon 9 to serve NASA’s needs to carry cargo and, eventually, astronauts to the International Space Station.

Jim Cantrell, one of the first employees of SpaceX, did not understand that decision and left the company. In 2015, he started Vector Launch, Inc., with headquarters in Tucson. Its goal is to make the Model T of rockets — small, cheap, mass-produced.

Vector claims that it can send its rockets into orbit from almost any place it can set up its mobile launch platform, which is basically a heavily modified trailer. That trailer was inspired by Mr. Cantrell’s hobby, auto racing, and many of the companies’ employees come from the racing world, too.

The company is still aiming to meet its goal of getting the first of its Vector-R rockets to orbit this year, but Mr. Cantrell admitted that the schedule might slip again, into early 2019. The flight termination system — the piece of hardware that disables the rocket if anything goes wrong — is late in arriving.

“There are a lot of little things,” Mr. Cantrell said. “It drives you crazy.”

A prototype was planned for suborbital launch from Mojave, Calif., in September, but it encountered a glitch and the test was called off. The crew put the rocket in a racecar trailer and drove it to Vector’s testing site at Pinal Airpark, a small airport a half-hour outside of Tucson that is surrounded 350 acres of shrubby desert.

Vector built test stands for firings of individual engines as well as completed rocket stages. During a recent visit to the site, engineers were troubleshooting the launch problems of both the prototype rocket and a developmental version of its upper-stage engine.

Soon the team will head to the Pacific Spaceport Complex, on Alaska’s Kodiak Island, for its first orbital launch. Next year, Mr. Cantrell said, the company hopes to put a dozen rockets into space.

Within a few years, he added, it could be launching 100 times a year, not just from Kodiak but also from Vandenberg Air Force Base in California and Wallops Island in Virginia, where Rocket Lab agreed in October to build its second launch complex. Vector is also looking for additional launch sites, including one by the Sea of Cortez in Mexico.

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Space analysts wonder how much of a market exists for a behemoth like SpaceX’s Falcon Heavy, which first launched in February. Though it can lift far heavier payloads than the Electron, the Heavy has only a half-dozen announced customers.CreditThom Baur/Reuters

Tom Markusic, another veteran of SpaceX’s early days, also sees an opportunity to help smaller satellites get to space.

“I didn’t feel there was a properly sized launch company to address that market,” he said.

Mr. Markusic said that the need for stronger antennas and cameras would ultimately prompt the construction of slightly bigger small satellites, and that it would be beneficial to be able to launch several at a time.

He started Firefly in 2014, aiming to build Alpha, a rocket that would lift a 900-pound payload to orbit.

The company grew to 150 employees and won a NASA contract. But in the uncertainty surrounding Britain’s exit from the European Union, a European investor backed out. An American investor also became skittish, Mr. Markusic said, after a SpaceX rocket exploded on the launchpad in 2016. Firefly shut down, and the employees lost their jobs.

At an auction, a Ukraine-born entrepreneur, Max Polyakov, one of Firefly’s investors, resurrected the company. Mr. Markusic took the opportunity to rethink the Alpha rocket, which is now able to launch more than 2,000 pounds.

“Alpha is basically Falcon 1 with some better technology,” he said.

Mr. Markusic said his competition was not the smaller rockets of Rocket Lab, Vector or Virgin Orbit but foreign competitors such as a government-subsidized rocket from India and commercial endeavors in China. But he complimented Rocket Lab.

“They’re ahead of everyone else,” he said. “I think they deserve a lot of credit.”

Firefly plans to launch its first Alpha rocket in December of 2019.

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A LauncherOne rocket under the wing of a Virgin Orbit Boeing 747, which releases the rocket mid-air at 35,000 feet. CreditGreg Robinson/Virgin Orbit, via Associated Press

Not everyone is convinced that the market for small satellites will be as robust as predicted.

“That equation has weaknesses at every step,” said Carissa Christensen, founder and chief executive of Bryce Space and Technology, an aerospace consulting firm.

Three-quarters of venture capital-financed companies fail, she said, and the same will likely happen to the companies aiming to put up the small satellites. She also is skeptical that space-based internet will win against ground-based alternatives.

“Publicly, there’s no compelling business plans,” she said.

That means that the market for small rockets could implode for lack of business. She said a key to survival would be to tap into the needs of the United States government, especially the military. Virgin Orbit, Vector and Rocket Lab were the current front-runners, she said.

The small rocket companies also have to compete with Spaceflight Industries, a Seattle company that resells empty space on larger rockets that is not taken up by the main payload. In addition, Spaceflight is looking to purchasing entire rockets launched by other companies, including Rocket Lab, and selling the payload space to a range of companies heading to a similar orbit.

The first such flight, using a SpaceX Falcon 9, is to launch from Vandenberg Air Force Base this month carrying 70 satellites, in what the company compares to a bus ride into orbit.

Curt Blake, president of Spaceflight, said that both approaches can work. Buses are cheaper but less convenient, and sometimes the timely lift from a taxi is worth the added cost.

Mr. Anderson of Space Angels was also optimistic. “The difference today is how robust the sector is,” he said. “The sector today can handle failures.”

While the sector is getting off the ground, Rocket Lab doesn’t intend to waste any more time: it is hoping to quickly follow “It’s Business Time” with a second commercial launch next month, and then a third the month after that.

“We’re very focused on the next 100 rockets, not the next one rocket.” Mr. Beck said. “It’s one thing to go to orbit. It’s a whole another thing to go to orbit on a regular basis.”

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Michael Roston contributed reporting.

Kenneth Chang has been at The Times since 2000, writing about physics, geology, chemistry, and the planets. Before becoming a science writer, he was a graduate student whose research involved the control of chaos. @kchangnyt

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