Banking & Finance Archives - Page 2 of 4 - earn money online hindi news: Sunnywebmoney.com

SunnyNovember 11, 2018
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Updated Mon, 12 Nov 2018 03:59 AM IST

ख़बर सुनें

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन पर निशाना साधे हुए वस्तु व सेवा कर (जीएसटी) को ऐतिहासिक कर सुधार करार दिया। उन्होंने कहा कि जीएसटी से महज दो तिमाही के लिए ही विकास दर प्रभावित हुई थी। दरअसल, राजन ने कहा था कि जीएसटी लागू करने से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) बुरी तरह प्रभावित हुआ था।

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जेटली ने रविवार को राजन का नाम लिए बिना कहा कि जीएसटी की बदौलत ही विकास दर 7 फीसदी, फिर 7.7 फीसदी और पिछले तिमाही में 8.2 फीसदी तक पहुंची। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की 100वीं सालगिरह के मौके पर वित्त मंत्री ने कहा कि पिछली तिमाही में मिली विकास दर 2012 से 2014 के बीच विकास दर में बढ़ोतरी की 5-6 फीसदी की दर से कहीं अधिक है।

बैंकिंग सिस्टम से एनपीए हटाना जरूरी
जेटली ने कहा कि बैंकिंग सिस्टम को मजबूत करने के लिए और विकास दर को सहयोग देने के लिए फंसे कर्ज (एनपीए) को घटाना पड़ेगा। इसके लिए विभिन्न तरीके अपनाए जा रहे हैं और प्रयोग निश्चित तौर पर सफलता दिलाते हैं। उन्होंने बाजारों में नकदी प्रवाह का संतुलन बनाए रखने के लिए भी बैंकिंग प्रणाली को मजबूत करने की जरूरत बताई।

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SunnyNovember 11, 2018
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Publish Date:Sun, 11 Nov 2018 07:05 PM (IST)

संवाद सहयोगी, बाढड़ा : बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष एवं पूर्व विधायक रणबीर ¨सह महेंद्रा ने कहा कि नोटबंदी व जीएसटी सरकार के अनुभवहीन फैसले थे। इन फैसलों से देश के करोड़ों लोग बेरोजगारी की चपेट में आ गए। देश के वित्त मंत्री करदाताओं की संख्या में वृद्धि को अपनी सफलता बता रहे है। जबकि सूरत, मुंबई, नोएडा जैसे शहरों में कारखानों से निकाले गए कर्मचारी आज भूखमरी के दौर से गुजर रहे हैं। महेंद्रा जनसंपर्क अभियान के दौरान ग्रामीणों को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान ने उन्होंने भाजपा सरकार पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि नोटबंदी पर केन्द्र सरकार की विफलता का परिणाम आने वाली कई पीढि़यों को भुगतना पड़ेगा। इसके अलावा क्षेत्र में पशु चोरी, नरमा की गिरदावरी रिपोर्ट में देरी सहित अनेक मामले आज किसानों व आमजन के गले की फांस बने हुए हैं। इसके बाद भी भाजपा सरकार सब कुछ ठीक होने का दावा कर रही है। क्षेत्र में पिछले एक साल के दौरान दो सौ से ज्यादा चोरी की घटनाओं के मामले दर्ज हो चुके है। रणबीर ¨सह महेंद्रा ने कहा कि गांव बलाली में सरसों चोरी की घटना हुई थी, चोरी की बरामदगी को लेकर गांव की पंचायत एसपी से भी मिली और थाना में शिकायत की थी, लेकिन आज तक इस मामले में कुछ भी नहीं हो पाया है। उन्होंने कहा कि जनता का भाजपा सरकार से विश्वास उठता जा रहा है। सफेद मक्खी व तेज अंधड़ से बर्बाद हुई नरमा व अन्य फसलों के मुआवजे के लिए हलके के किसान दर-दर भटक रहे हैं। इस दौरान उनके साथ पूर्व चेयरमैन प्रीतम बलाली, सरपंच सुरेश धनासरी, पूर्व सरपंच विजय फौजी काकड़ौली इत्यादि मौजूद थे।

Posted By: Jagran

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SunnyNovember 9, 2018
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ऐश्ली कुटिन्हो /  November 09, 2018

एचडीएफसी सिक्योरिटीज के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी धीरज रेली ने कहा है कि नकारात्मक वैश्विक संकेतों और देश में विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनाव व आम चुनाव के चलते उतारचढ़ाव बने रहने की संभावना है। ऐश्ली कुटिन्हो को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि सुरक्षात्मक लिहाज से निवेशकों को उच्च आय की संभावना वाली गुणवत्ता कंपनियों की तरफ जाना चाहिए, चाहे उसका मूल्यांकन ज्यादा क्यों न हो। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश…

बाजार के लिए आपका नजरिया?

बाजार मूल्यांकन में हाल के महीनों में गिरावट आई है, लेकिन उतारचढ़ाव बने रहने की संभावना है। इसकी वजह नकारात्मक वैश्विक संकेतों और देसी मोर्चे पर चुनाव, तेल की उच्च कीमतों के चलते चालू खाते के घाटे पर राजकोषीय घाटे पर दबाव आदि है। इस गिरावट में मूल्यांकन हालांकि फिसला है, लेकिन एमएससीआई ईएम यूनिवर्स में और विगत के हमारे खुद के प्रीमियम के लिहाज से भारत लगातार प्रीमियम पर बना हुआ है। मूल्यांकन के हिसाब से कंपनियों में आय में सुधार अभी बाकी है। तेल की उच्च कीमतों और सख्त वित्तीय हालात के चलते बढ़त की रफ्तार पर असर पड़ सकता है। चुनावी वर्ष में सरकार की तरफ से ज्यादा खर्च का नकारात्मक असर पड़ सकता है। शहरी व ग्रामीण भारत में सुधार को देखते हुए अर्थव्यवस्था पटरी पर नजर आ रही है। इसके अलावा राजकोषीय अनुशासन को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता और चालू खाते के घाटे के प्रबंधन के लिए विभिन्न तरीकों पर हो रहा काम सकारात्मक है। उधारी की रफ्तार विभिन्न क्षेत्रों में सुधरी है, दिवालिया की प्रक्रिया में कुछ कामयाबी मिली है, खुदरा परिसंपत्तियों की गुणवत्ता ठीक बनी हुई है और बचत को वित्तीय प्रतिभूतियों में लगाने के मामले सुधरे हैं, जिससे बीमा व म्युचुअल फंड जैसे क्षेत्रों को फायदा हुआ है।

क्या भारतीय बाजारों का मूल्यांकन अभी ज्यादा नजर आ रहा है?

गिरावट के बाद भारतीय बाजार अब महंगे नहीं रह गए, लेकिन निवेशकों को आकर्षित करने के लिए क्या यह पर्याप्त रूप से सस्ता है यह हर निवेशक के अपने अनुभव और समयसीमा पर निर्भर करता है। निवेशकों को गुणवत्ता वाले मिडकैप शेयरों पर नजर डालना चाहिए, जिसकी आय के बारे में स्पष्टता हो, प्रबंधन अच्छा हो। मिडकैप व स्मॉलकैप शेयरों की चाल आश्चर्यचकित करती रहेगी, जो उनके आकार व आधार, बदलाव के प्रति तीव्र समायोजन, वित्तीय व परिचालन पुनर्गठन, कॉरपोरेट घोषणाएं मसलन विलय, कारोबार अलग करना, कायापलट आदि पर आधारित होगी। इस क्षेत्र से निवेशकों को बेहतर रिटर्न ऐसे समय में मिलेगा जब लार्जकैप फंड अपने बेंचमार्क सूचकांकों के रिटर्न को दोहराने में मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। 

उभरते बाजारों को इस साल झटका लगा है। क्या आपको इस झटके में और बढ़ोतरी दिख रही है और उभरते बाजारों में भारत की जगह कहां है?

उभरते बाजारों की परिसंपत्तियां वैश्विक निवेशकों के हक में बनी रहेंगी, जो अच्छे या असामान्य रिटर्न की तलाश कर रहे हैं। अर्थव्यवस्थाओं व मुद्राओं में कमजोरी और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में ब्याज दरों में इजाफे के चलते पिछले दो महीने में उभरते बाजारों में परेशानी रही है। इसे सुधरने में थोड़ा लंबा समय लग सकता है, लेकिन वैश्विक निवेशक दोबारा प्रवेश के लिए उभरते बाजारों की परिसंपत्तियों पर नजर बनाए रखेंगे। उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भारत सही जगह पर है। 

पिछले कुछ महीनों से एफपीआई भारत से निवेश की निकासी कर रहे हैं। क्या यह प्रवृत्ति जारी रहेगी?

भारतीय रुपये में आई हालिया गिरावट से कुछ एफपीआई हतोत्साहित हुए हैं। भारत में बढ़त की क्षमता अभी तक निर्विवाद रही है, सिर्फ इसकी गति व समयसीमा के बारे में पता नहीं है। यह अन्य बातों के अलावा चुनाव के बाद नई सरकार और विकसित अर्थव्यवस्थाओं में ब्याज दर के चक्र पर निर्भर करेगा। चूंकि कैलेंडर वर्ष समाप्त होने वाला है लिहाजा एफपीआई की कुछ बिकवाली जारी रह सकती है। हालांकि नए कैलेंडर वर्ष में इसकी रफ्तार धीमी पड़ सकती है। वास्तव में आम चुनाव से पहले हम इस प्रवृत्ति में बदलाव देख सकते हैं।

आगामी महीनों में बाजार पर चुनाव का क्या असर दिखेगा?

प्रमुख राज्यों में 28 नवंबर से 7 दितंबर तक चुनाव होंगे। इसके बाद एग्जिट पोल पर नजर रहेगी और बाजार में इस वजह से उतारचढ़ाव हो सकता है। राज्य चुनावों के परिणाम को आम चुनाव के पूर्व लक्षण के तौर पर देखा जाएगा, जो एक-दो तिमाही बाद होने वाले हैं। बाजार की प्रतिक्रिया चुनाव नतीजे पर निर्भर करेगी कि क्या इस सरकार को बहुमत मिलता है या फिर नया गठबंधन इसकी जगह लेता है।

क्या कंपनियों की आय में आगामी तिमाहियों में सुधार होगा?

2-3 साल की स्थिर आय के बाद कंपनियों की आय में वित्त वर्ष 2018 में मामूली सुधार हुआ और वित्त वर्ष 2019 और वित्त वर्ष 2020 के लिए ज्यादा उम्मीद है। वित्त वर्ष 2019 की दूसरी तिमाही के नतीजे कमोबेश उम्मीद के मुताबिक या इससे ऊपर रहे हैं। साल दर साल के हिसाब से करीब 21 फीसदी बढ़ा, वहीं परिचालन मुनाफा मार्जिन दबाव में बना रहा क्योंंकि इनपुट लागत ज्यादा थी। जिन क्षेत्रों पर मार्जिन का असर पड़ा उनमें वाहन, सीमेंट व एफएमसीजी शामिल हैं। बैंकिंग व इंडस्ट्रियल ने हालांकि चौंकाया है। हमें उम्मीद है कि व्यापार युद्ध वैश्विक स्तर पर ज्यादा नहीं बढ़ेगा।

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SunnyNovember 9, 2018
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धीरज तिवारी, नई दिल्ली

सरकार को उम्मीद है कि चार पब्लिक सेक्टर बैंक (पीएसबी) रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के प्रॉम्प्ट करेक्टिव ऐक्शन (पीसीए) फ्रेमवर्क से बाहर आ जाएंगे क्योंकि उनके फाइनैंशल परफॉर्मेंस में सुधार हुआ है। केंद्र सरकार इसका हवाला देकर रिजर्व बैंक से पीसीए में बचे रह गए बाकी के सात बैंकों के लिए शर्तों में ढील देने की मांग करेगी ताकि वे भी इससे जल्द बाहर आ सकें और कर्ज बांटना शुरू करें। वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी ने यह जानकारी दी है। अभी सरकार और रिजर्व बैंक के बीच जिन मुद्दों पर टकराव चल रहा है, उसमें से एक यह भी है। अधिकारी ने बताया, ‘पीसीए की कुछ शर्तों में ढील दी जाती है तो उससे तेजी से रिकवरी करने में मदद मिलेगी।’

इन चार बैंकों को PCA से बाहर आने की उम्मीद

सरकार का मानना है कि बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ महाराष्ट्र और कॉर्पोरेशन बैंक फाइनैंशल परफॉर्मेंस के आधार पर पीसीए से बाहर आ जाएंगे। अभी कुल 11 सरकारी बैंक इस फ्रेमवर्क में रखे गए हैं। अधिकारी ने बताया, ‘तीसरी यानी अक्टूबर-दिसंबर तिमाही के अंत तक इन बैंकों का टर्नअराउंड हो सकता है। इससे यह भी पता चलता है कि पब्लिक सेक्टर के बैंकों ने सरकार के साथ जो ऐक्शन प्लान शेयर किया है, वे उसका पालन कर रहे हैं।’ केंद्र पहले ही कह चुका है कि परफॉर्मेंस के आधार पर ही सरकारी बैंकों की फंडिंग की जाएगी।

बैंकों के लिए PCA का मतलब क्या?

जिन बैंकों को पीसीए में डाला जाता है, उन्हें रिस्की ऐसेट्स कम करने पड़ते हैं। उनके बिना रेटिंग वाली कंपनियों को कर्ज देने पर पाबंदी लग जाती है। इसके साथ इन बैंकों को ऐसेट की बिक्री करनी पड़ती है और रिकवरी प्लान बनाना पड़ता है। आरबीआई पीसीए वाले बैंकों की कैपिटल, ऐसेट क्वॉलिटी और प्रॉफिटेबिलिटी पर नजर रखता है ताकि उनके बैड लोन में और बढ़ोतरी न हो। सरकार का कहना है कि बड़ी संख्या में पब्लिक सेक्टर बैंकों को पीसीए में डाले जाने से लोन ग्रोथ सुस्त पड़ गई है और उसका निवेश पर बुरा असर पड़ रहा है। इससे ग्रोथ तेज नहीं हो पा रही है और रोजगार के मौके नहीं बन रहे हैं।

PCA पर सख्त है RBI

आरबीआई ने पहले पीसीए का मजबूती से बचाव किया था। पिछले महीने रिजर्व बैंक के डेप्युटी गवर्नर विरल आचार्य ने कहा था कि कमजोर बैंकों के लिए पीसीए की शर्तों में कोई ढील नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा था, ‘जोखिम का सामना कर रहे बैंक को बचाने का पहला उपाय उसे पीसीए में डालना है। इन बैंकों के बिजनस मॉडल को लॉन्ग टर्म में ठीक करने के लिए डीप बैंकिंग रिफॉर्म्स की जरूरत है।’ उन्होंने यह बात 26 अक्टूबर की उसी स्पीच में कही थी, जिसमें रिजर्व बैंक की स्वायत्तता से समझौते को लेकर आचार्य ने सरकार को चेतावनी दी थी।

19 नवंबर की मीटिंग पर नजर

इकनॉमिक टाइम्स ने पहले खबर दी थी कि सरकार आरबीआई ऐक्ट के सेक्शन 7 के तहत दर्जनभर मुद्दों पर रिजर्व बैंक से चर्चा चाहती है। पीसीए भी इनमें से एक है। सरकार को उम्मीद है कि 19 नवंबर की रिजर्व बैंक के बोर्ड की अगली मीटिंग में इनमें से कुछ मुद्दों का समाधान निकलेगा। केंद्र का कहना है कि दिवालिया कानून के तहत कई बड़े डिफॉल्टर्स के मामलों को सुलझाया गया है। इससे पीसीए फ्रेमवर्क में डाले गए कुछ बैंकों के बैड लोन में कमी आएगी। एक सरकारी अधिकारी ने बताया कि पब्लिक सेक्टर के बैंक वित्त वर्ष 2019 में 1.8 लाख के लोन रिकवरी टारगेट को पार कर जाएंगे। बैंकों ने इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 36,551 करोड़ के बैड लोन की रिकवरी की थी। वहीं, पिछले वित्त वर्ष में बैंकों की रिकवरी 74,562 करोड़ रुपये रही थी।

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SunnyNovember 8, 2018
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नर्इ दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक व केंद्र सरकार के बीच विवाद अब नीति आयोग के पूर्व वाइस चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया ने एक सलाह दी है। नीति आयोग के पूर्व वाइस चेयरमैन ने कहा है कि सरकार व आरबीआर्इ, दोनों को आपसी मतभेद काे जल्द से जल्द सुलझा लेना चाहिए। उन्हाेंने कहा कि इस विवाद को खत्म करना देशहित के लिए सही होगा। एक न्यूज एजेंसी को दिए गए अपने इंटरव्यू में अरविंद पनगढ़िया ने कहा कि कानूनी ताैर पर आरबीआर्इ के पास अमरीकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की तुलना में कम स्वायत्तता है।

उन्होंने कहा कि आरबीआर्इ व सरकार को आपसी सहयोग से काम करना चाहिए। यदि दोनों के बीच कोर्इ मतभेद होता है कुछ चीजाें को नजरअंदाज करना चाहिए। देशहित में उन्हें यह काम करना चाहिए। बता दें कि अरविंद पनगढ़िया फिलहाल कोलम्बिया विश्वविद्यालय में इंडियन पाॅलिटिकल इकोनाॅमी के प्रोफेसर हैं। उन्होंने कहा कि अमरीका में कर्इ बार फेड रिजर्व व अमरीकी सरकार आपसी एक दूसरे के साथ बेहतर सहयोग से काम करते हैं। साल 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान दोनों के बीच तालमेल इसका सबसे बेहतर उदाहरण है।

हालांकि, साथ में उन्होंने यह भी कहा कि जिस तरह से इसे मीडिया में उछाला गया वो काफी निराशाजनक है। मीडिया में इसे एक बड़े विवाद के तौर पर लिया गया जो कि गलत है। इसके पहले भी ब्याज दर, वित्तीय तरलता व बैंकिंग सेक्टर को लेकर वित्त मंत्रालय आैर केंद्रीय बैंक के बीच विवाद सामने आए हैं। लेकिन बाद में दोनों के बीच शांतिपूर्ण समझौता हुआ है। इस बार यह विवाद सरकार द्वारा आरबीआर्इ एक्ट के तहत सेक्शन 7 के इस्तेमाल से हुआ है जिसका पहले कभी इस्तेमाल नहीं किया गया था।

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SunnyNovember 6, 2018
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स्वाति वर्मा /  November 06, 2018

शेयर बाजार में उतारचढ़ाव को देखते हुए निवेशक यह तलाशने लगे हैं कि आखिर निचला स्तर क्या हो सकता है। इन्वेस्को म्युचुअल फंड के मुख्य निवेश अधिकारी (इक्विटीज) ताहिर बादशाह ने स्वाति वर्मा से म्युचुअल फंड उद्योग के बारे में विस्तार से बातचीत की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश..

मार्च के आखिर तक बेंचमार्क सूचकांक किस स्तर पर नजर आएगा?

विस्तृत इक्विटी बाजार में कैलेंडर वर्ष 2018 की शुरुआत से ही कमजोरी दिख रही है, जिसकी वजह जिंसों की कीमतें, ब्याज दरें और चालू व राजकोषीय खाते हैं। इस पृष्ठभूमि में आय की रफ्तार में सुधार के बिना उच्च मूल्यांकन ने काफी कम गुंजाइश छोड़ी और बाजार में हाल में आई तेज गिरावट की मुख्य वजह यही है। प्रमुख सूचकांकों में मौजूदा स्तर से संभावित तौर पर पांच से सात फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। 

आईएलऐंडएफएस के घटनाक्रम ने बैंकिंग व एनबीएफसी को काफी बड़ा झटका दिया है। क्या हमें गिरावट का इस्तेमाल इनकी खरीद में करनी चाहिए?

एनबीएफसी में आई गिरावट इस क्षेत्र में निवेश का दिलचस्प मौका मुहैया करा सकता है। पिछले घटनाक्रम और ऐसे संशोधित अनुमान के लिए मूल्यांकन पर दोबारा नजर डालने के बाद निवेश के लिहाज से इस क्षेत्र की कंपनियों के बढ़त अनुमान को फिर से देखना होगा। 

इस साल आपकी निवेश की क्या रणनीति है?

इसके तहत मोटे तौर पर निचले स्तर पर आए शेयरों की खरीद हुई है, जिसमें प्रोप्राइटरी इन्वेस्टमेंट फ्रेमवर्क से मदद मिली। कंज्यूमर ड्रिस्क्रिश्नरी, फाइनैंशियल, सूचना प्रौद्योगिकी और इंडस्ट्रियल क्षेत्र के शेयरों पर हमारा ध्यान बना रहा। ऐसेट एलोकेशन फंड को छोड़कर हमारे पोर्टफोलियो की नकदी का स्तर सभी परिस्थितियों में पांच फीसदी से ज्यादा नहीं रहता।

पिछले कुछ महीनों में म्युचुअल फंडों में निवेश नरम हुआ है। क्या आप प्रवृत्ति में बदलाव देख रहे हैं?

हाल के महीनों में निवेशकोंं का भरोसा घटा है, हालांकि स्थिति अभी चिंताजनक नहीं है। मासिक एसआईपी निवेश मजबूत बना हुआ है, वहीं एकमुश्त निवेश को रफ्तार पकडऩे में थोड़ा समय लग सकता है।

क्या आपकी योजनाओं को निवेश निकासी का दबाव झेलना पड़ा है?

हाल के महीनों में हमारे इक्विटी कारोबार ने मजबूत व सकारात्मक रफ्तार बनाए रखी है। उद्योग पर निवेश निकासी का दबाव ऐसे परिदृश्य में और बढ़ सकता है जब आर्थिक हालात में और गिरावट देखने को मिले।

अभी बाजारों के लिए सबसे बड़ा अवरोध क्या है?

बाजारों का प्रमुख अवरोध क्रेडिट बाजार और उपभोक्ताओं के की धारणा में संभावित गिरावट के इर्द-गिर्द है, जिससे उपभोग की रफ्तार घट रही है। अगले दो से तीन महीनों में राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आ जाएंगे, जिस पर निवेशक नजर डालना चाहेंगे।

वित्त वर्ष 2019 और वित्त वर्ष 2020 में कंपनियों की आय की रफ्तार कैसी रहेगी?

आर्थिक अनिश्चितताओं के मद्देनजर बढ़त की उम्मीद को नियंत्रण में रखना समझदारी होगी। आधार प्रभाव, आयात पर मुद्रा के फायदे और वैश्विक साइक्लिकल बढ़त को सहारा देंगे, लेकिन हम वैसी स्थिति देखना चाहेंगे जिससे भारतीय कंपनी जगत की आय की रफ्तार में गुणवत्तापूर्ण व सतत सुधार हो सके।

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SunnyNovember 6, 2018
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देश का सबसे बड़ा बैंक है रिजर्व बैंक. पूरे देश की बैंकिंग सिस्टम को कंट्रोल करने वाला ये इकलौता बैंक है. लेकिन पिछले कुछ दिनों से इस बैंक के साथ सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. वजह ये है कि केंद्र सरकार रिजर्व बैंक के कामकाज से नाराज है. रिजर्व बैंक के मुखिया उर्जित पटेल और वित्त मंत्रालय के बीच की नाराजगी सबके सामने आ चुकी है. केंद्र सरकार कह रही है कि अगर रिजर्व बैंक उसकी बात नहीं मानेगा तो वो सेक्शन सात का इस्तेमाल करेगी. सेक्शन सात के इस्तेमाल का मतलब होगा कि रिजर्व बैंक का कामकाज सीधे तौर पर केंद्र सरकार के पास आ जाएगा. इसका इस्तेमाल होगा या नहीं होगा, ये 19 नवंबर को तय होगा. 19 नवंबर को रिजर्व बैंक की बैठक होने वाली है और कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार इस बैठक के बाद रिजर्व बैंक के गवर्नर की भूमिका को कम कर सकती है.

रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल
रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के इस्तीफे की खबरें चल रही हैं. फैसला 19 नवंबर को हो सकता है.

19 नवंबर को क्या होगा, ये तो नहीं पता, लेकिन सरकार फिलहाल एक और बड़ा कदम उठाने वाली है. केंद्र सरकार चाहती है कि रिजर्व बैंक के पास जो पैसे सुरक्षित हैं, उसका एक तिहाई हिस्सा निकाल लिया जाए और उसे अर्थव्यवस्था में शामिल किया जाए. इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक रिजर्व बैंक के रिजर्व खाते में कुल 9.59 लाख करोड़ रुपये हैं. केंद्र सरकार चाहती है कि इसका एक तिहाई हिस्सा यानि कि कुल 3.6 लाख करोड़ रुपये निकाल लिए जाएं और इसका इस्तेमाल किया जाए. केंद्र सरकार ने ये भी प्रस्ताव दिया है कि इस पैसे को कैसे खर्च किया जाएगा, ये रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और केंद्र सरकार मिलकर तय कर लेगी.

वित्त मंत्रालय ने कहा-इतना कैश रखना है पुराना तरीका

वित्त मंत्रालय चाहता है कि रिजर्व बैंक रिजर्व में रखे हुए पैसे उसे दे दे, ताकि सरकारी बैंकों के कर्ज को कम किया जा सके.
वित्त मंत्रालय चाहता है कि रिजर्व बैंक रिजर्व में रखे हुए पैसे उसे दे दे, ताकि सरकारी बैंकों के कर्ज को कम किया जा सके.

वित्त मंत्रालय का मानना है कि रिजर्व में इतना ज्यादा कैश रखना पुरानी परंपरा है और अब इसे बदलने की ज़रूरत है. इसलिए इस पैसे को निकाला जाए और फिर इसे कर्ज चुकाने और विकास के और कामों पर खर्च किया जाए. केंद्र सरकार का मानना है कि इस पैसे से सरकारी बैंक नए कर्ज दे सकेंगे और अपनी आमदनी बढ़ा सकेंगे.

रिजर्व बैंक ने कहा- होगा बड़ा नुकसान

राम लखन की जोड़ी
पैसे देने के मामले में उर्जित पटेल ने रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन की नीतियों का समर्थन किया है.

रिजर्व बैंक का मानना है कि अगर इतनी बड़ी मात्रा में रिजर्व में रखा कैश बाहर निकाल लिया जाएगा, तो इससे देश की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हो सकता है. रिजर्व बैंक का मानना है कि रिजर्व में रखे पैसे से बैंकों की कमाई नहीं बढ़ेगी. इसके अलावा अगर इतनी बड़ी मात्रा में पैसे निकाल लिए जाएं, तो इससे बाजार का भरोसा कम हो जाएगा और फिर दूसरे देश भारत से व्यापार करने में डरने लगेंगे.

पहले भी पैसे दे चुका है रिजर्व बैंक

RBI

रिजर्व बैंक इस सरकार को अपने रिजर्व में रखे पैसे पहले भी दे चुका है. 2017-18 में रिजर्व बैंक ने 50,000 करोड़ रुपये की रकम अपने रिजर्व से केन्द्र सरकार को दी थी. 2016-17 में भी रिजर्व बैंक ने 30,659 करोड़ रुपये केन्द्र सरकार को दिए थे. इतने पैसे देने के बाद भी न तो देश की अर्थव्यवस्था सुधरी और न ही सरकारी बैंकों की हालत. इसलिए इस बार रिजर्व बैंक पैसे देने से मना कर रहा है. भारत के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने 2016-17 के आर्थिक सर्वे में कहा था कि रिजर्व बैंक के पास रिजर्व में करीब चार लाख करोड़ रुपये ज्यादा पैसे हैं और इस पैसे को बैंक को केंद्र सरकार को दे देना चाहिए. लेकिन उस वक्त रिजर्व बैंक के गवर्नर जनरल रहे रघुराम राजन ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था.


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SunnyNovember 5, 2018
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    SunnyNovember 4, 2018
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    वित्त मंत्रालय सरकारी बैंकों को देगा राहत, 15 दिसम्बर तक इतने हजार करोड़ रुपये मिलेंगे | Zee Business hindi

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