कर बचाने को वहीं करें निवेश जहां पूरा हो आपका उद्देश्य – Business Standard Hindi

संजय कुमार सिंह /  January 13, 2019

वित्त वर्ष खत्म होने में बमुश्किल ढाई महीने बचे हैं। अगर अभी तक आपने कर बचाने के लिए निवेश नहीं किया है तो फटाफट इस मोर्चे पर जुट जाइए और कर की मार से बचने के लिए निवेश कर डालिए। लेकिन जब आप कर बचाने वाली योजनाओं में निवेश करें तो इस बात का ध्यान जरूर रखें कि आपका निवेश आपकी वित्तीय योजना के मुताबिक ही हो और वित्तीय लक्ष्य हासिल करने में आपकी मदद करने वाला हो। बिना सोचे-समझे और सतर्कता बरते बगैर किसी भी योजना में निवेश कर देने से आपकी माली सेहत को बड़ा नुकसान हो सकता है।

सबसे पहले बीमा देखें

कर बचाने के लिए निवेश करने जा रहे हैं तो सबसे पहले जांचिए कि आपकी वित्तीय योजना में कमी कहां है। देखिए कि आपके पास पर्याप्त बीमा है या नहीं। आयकर अधिनियम की धारा 80 सी के तहत जीवन बीमा पर और धारा 80 डी के तहत स्वास्थ्य बीमा पर कर बचत का फायदा मिलता है। आपके पास पर्याप्त बीमा है या नहीं, यह जानने का तरीका बिल्कुल सरल और सीधा है। आपके पास इतनी संपत्तियां और जीवन बीमा कवर होना चाहिए कि आपकी सभी जिम्मेदारियां पूरी हो सकें, बड़े वित्तीय लक्ष्यों के लिए इंतजाम हो सके और आपके परिवार की नियमित जरूरतें भी पूरी हो सकें। अगर आपको यह झंझट भरी कवायद लगती है तो और भी आसान रास्ता है। अपनी क्षमता के मुताबिक अपनी सालाना आय की 10 से 15 गुना रकम का टर्म बीमा खरीद लीजिए। क्लियरटैक्स के संस्थापक और मुख्य कार्य अधिकारी अर्चित गुप्ता की सलाह है, ‘ऐसी योजनाओं को दूर से ही नमस्ते कर लीजिए, जिनमें निवेश और बीमा साथ-साथ हों। टर्म बीमा लेने पर आपको कम प्रीमियम में अधिक एश्योर्ड राशि हासिल हो जाएगी।’ इसके बाद देखिए कि आपने कितना स्वास्थ्य बीमा लिया है। आपके नियोक्ता ने आपको समूह स्वास्थ्य बीमा योजना का फायदा दिया हो या न दिया हो, अपने परिवार के लिए आपको व्यक्तिगत स्वास्थ्य बीमा कवर जरूर लेना चाहिए।

जोखिम उठा सकें तो निवेश करें

निवेश करने से पहले आपको देखना चाहिए कि आपके पुराने निवेश और खर्चों से धारा 80 सी के तहत आपको कितनी कर छूट मिल पा रही है। मिसाल के तौर पर हो सकता है कि आप कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) में योगदान कर रहे हों या जीवन बीमा प्रीमियम चुका रहे हों। अगर आपने आवास ऋण लिया है तो उसका मूल राशि वाले हिस्से का भुगतान भी 80 सी के तहत ही आता है। यदि आप तीनों में योगदान कर रहे हैं तो धारा 80 सी के तहत आपको मामूली निवेश की ही जरूरत पड़ेगी। धारा 80 सी के तहत आपको कर छूट दिलाने वाली ज्यादातर निवेश योजनाएं डेट योजनाएं होती हैं। केवल यूनिट लिंक्ड बीमा योजनाएं (यूलिप) और इक्विटी लिंक्ड बचत योजनाएं (ईएलएसएस) इक्विटी योजनाएं हैं।  डेट लेना है या इक्विटी, इसका फैसला अपने मौजूदा संपत्ति निवेश पोर्टफोलियो के संपत्ति आवंटन को देखकर करें। इक्विटी में निवेश करना हो तो ईएलएसएस को तरजीह दीजिए। गुप्ता कहते हैं, ‘ईएलएसएस में निवेश करने से पहले देख लीजिए कि आप कितना जोखिम उठा सकते हैं। ऊंचा प्रतिफल चाहिए तो आपको ईएलएसएस में पांच साल से भी ज्यादा अरसे तक निवेश रखना होगा।’ डेट में निवेश करना है तो सार्वजनिक भविष्य निधि (पीपीएफ) का रास्ता पकडि़ए क्योंकि इसमें निवेश करते समय आपको कर छूट का फायदा मिलता है और अवधि पूरी होने पर निकासी भी कर मुक्त होती है।

युवा हैं तो यूलिप पकड़ें

भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) के नियमों के मुताबिक अगर आपकी उम्र 45 साल से कम है तो आपके यूलिप में एश्योर्ड राशि प्रीमियम की कम से कम 10 गुना होनी चाहिए। लेकिन अगर आपकी उम्र 45 साल से अधिक है तो न्यूनतम एश्योर्ड राशि प्रीमियम की सात गुना ही होगी। उधर आयकर नियमों के मुताबिक परिपक्वता पर मिलने वाली राशि पर कर से छूट तभी मिलेगी, जब एश्योर्ड राशि सालाना प्रीमियम की 10 गुना हो। सेबी में पंजीकृत निवेश सलाहकार पसर्नलफाइनैंसप्लान डॉट इन के संस्थापक दीपेश राघव कहते हैं, ‘जिनकी उम्र ज्यादा है, उन्हें निवेश करते समय यह सुनिश्चित करना पड़ेगा कि वही यूलिप खरीदें, जो इस शर्त को पूरी करता हो।’ युवा निवेशक तो यूलिप खरीद सकते हैं, लेकिन अधिक उम्र के निवेशकों को उनसे दूर ही रहना चाहिए। 

राघव कहते हैं, ‘यूलिप निवेश और बीमा की मिली-जुली योजना है। आपके प्रीमियम का एक हिस्सा बीमा वाली लागत पूरी करने में जाता है। युवाओं के लिए यह लागत कम होती है, इसलिए यूलिप उनके लिए खराब नहीं है। लेकिन जैसे-जैसे आपकी उम्र बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे बीमा वाला हिस्सा बढ़ता जाता है और निवेशकों को मिलने वाले प्रतिफल पर असर पड़ता है।’

मिससेलिंग से बचें

जब कर बचाने की गहमागहमी चलती है, उस समय पारंपरिक निवेश योजनाओं में गलत सूचना देकर फंसाने के वाकये सबसे ज्यादा होते हैं। ये योजनाएं सरकारी और दूसरे बॉन्डों में भारी निवेश करते हैं। शुरुआती सालों में एजेंटों का कमीशन भी बहुत अधिक होता है। इसलिए इन योजनाओं में प्रतिफल की आंतरिक दर कभी 3 से 6 फीसदी अधिक नहीं होती। इतना ही नहीं, उन्हें बंद करना भी मुश्किल होता है। यदि निवेशक कम से कम तीन साल तक प्रीमियम अदा नहीं करता है तो बीमा बंद करने पर उसकी पूरी रकम डूब जाती है। इतना ही नहीं, मरणशीलता शुल्क अधिक होने के कारण बुजुर्गों के लिए प्रतिफल की दर भी कम होती है।

बचें इन गलतियों से

कर बचाने के लिए क्या करना है, इसकी फिक्र अक्सर लोग वित्त वर्ष के अंत में ही करते हैं। निवेश के सबूत दिखाने की अंतिम समयसीमा (आम तौर पर फरवरी का पहला पखवाड़ा) जैसे ही नजदीक आती है, वे ऐसी किसी भी योजना में बिना समझे निवेश कर देते हैं, जो उस साल कर बचाने में उनकी मदद करती है। बाद में उन्हें महसूस होता है कि वह योजना उनके माफिक नहीं है और वे उसे बीच में ही छोड़ देते हैं। कई निवेशक तो कई बार ऐसा करते हैं। कम से कम नौकरियां शुरू करने के बाद शुरुआती कुछ सालों तक तो ऐसा होता ही है। कर बचाने की योजना अलग-थलग या केवल एक बार की गतिविधि नहीं होनी चाहिए। इसे आपकी कुल वित्तीय योजना के मुताबिक ही होना चाहिए।

गुप्ता का कहना है, ‘कर संबंधी योजना के सभी फैसले तीन बड़े पहलुओं को ध्यान में रखकर लेने चाहिए – आपके निजी वित्तीय लक्ष्य, जोखिम सहने की क्षमता और निवेश की मियाद।’ कई निवेशक कर बचाने वाली योजनाओं में जरूरत से ज्यादा निवेश कर जाते हैं। पॉजिटिव वाइब्स कंसल्टिंग एंड एडवाइजरी के संस्थापक मल्हार मजूमदार का कहना है, ‘कर बचाने की गहमागहमी के बीच एजेंट बीमा पॉलिसी बेचने में जुटे रहते हैं, इसलिए कई लोग ढेर सारी बीमा पॉलिसियां खरीद डालते हैं, जबकि धारा 80 सी के तहत कर बचाने के लिए निवेश की उनकी सीमा पहले ही पूरी हो चुकी होती है।’

कई निवेशक यह समझने में नाकाम रहते हैं कि कुछ योजनाएं निवेश के समय भी कर बचाने में मदद करती हैं और परिपक्वता अवधि पूरी होने के बाद भी उन पर कर नहीं वसूला जाता। पीपीएफ इसी श्रेणी में आता है। दूसरी ओर पांच साल की सावधि जमा जैसी निवेश योजनाओं पर निवेश के समय तो कर छूट का फायदा मिल जाता है, लेकिन उन पर मिलने वाला ब्याज कर के दायरे में आता है। जाहिर है कि पीपीएफ बेहतर योजना है। कई लोगों को यह पता ही नहीं होता कि राष्टï्रीय बचत प्रमाणपत्र (एनएससी) पर भी कर वसूला जाता है। कई लोग यह नहीं जानते कि राष्टï्रीय पेंशन योजना पर (धारा 80 सी के तहत तय छूट सीमा के ऊपर) 50,000 रुपये की अतिरिक्त कर छूट मिल जाती है या कर का वह फायदा तभी मिलेगा, जब आप टियर 1 योजना में निवेश करते हैं।

कुछ निवेशक अपनी कर बचत को इधर से उधर करते रहते हैं। वे उन निवेश योजनाओं से रकम निकाल लेते हैं, जिनकी लॉक-इन अवधि पूरी हो गई है और कर बचाने के लिए उस रकम का निवेश दोबारा कर देते हैं। मजूमदार का मशविरा है, ‘अगर वे रकम निवेश योजना में लगी रहने दें और हर साल अलग से निवेश करें तो आगे चलकर उनके पास अच्छी खासी रकम जमा हो जाएगी।’ अगर आप 80 सी के तहत कर बचाने की जुगत भिड़ा रहे हैं तो टर्म योजना, ईपीएफ, पीपीएफ और ईएलएसएस आपके लिए बेहतर चुनाव होंगे। जो निवेश जोखिम से दूर रहते हैं और बेहतर प्रतिफल चाहते हैं, उन्हें म्युचुअल फंड में रिटायरमेंट योजनाओं पर नजर डालनी चाहिए। ये हाइब्रिड फंड होते हैं, जिनकी लॉक-इन अवधि पांच साल होती है।

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