अगर आप किसी से बहुत खुश हैं तो बिना सोचे-समझे उसे किसी तरह का वादा न करें, नहीं तो भविष्य में आप किसी बड़ी मुसीबत में भी फंस सकते हैं – Dainik Bhaskar

रिलिजन डेस्क। दुनिया का हर इंसान सुखी जीवन जीना चाहता है। मगर सभी के जीवन में कुछ न कुछ दुख जरूर रहता है। इंसान जाने-अनजाने में ही कई बार ऐसे काम कर बैठता है, जिसकी वजह से आने वाले समय में उसे परेशानियां झेलनी पड़ती है। धर्म ग्रंथों में भी इन कामों के बारे में बताया गया है कि किस परिस्थिति में क्या करना चाहिए और क्या नहीं। आज हम आपको सुखी जीवन के 3 सूत्र बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं-

1. खुशी में वचन न दें
2. क्रोध में उत्तर न दें
3. दुख में निर्णय न लें

राजा दशरथ का वरदान बना दुखी का कारण
राजा दशरथ ने देव-असुर संग्राम में देवताओं का साथ दिया था। उनके साथ पत्नी कैकयी भी थी। कैकयी की वीरता से प्रसन्न होकर राजा दशरथ ने उन्हें वरदान मांगने के लिए कहा था। कैकयी ने कहा था कि समय आने पर वो ये वरदान मांग लेंगी। यही वरदान बाद में राजा दशरथ की परेशानी का कारण बने और श्रीराम को वनवास जाना पड़ा।

दुर्योधन का क्रोध बना कौरवों के विनाश का वजह
युद्ध से पहले जब भगवान श्रीकृष्ण शांति का प्रस्ताव लेकर दुर्योधन के पास गए तो उसने क्रोधित होकर बिना सोचे-समझे ही उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। इसका नतीजा ये हुआ कि दुर्योधन सहित पूरा कौरव वंश ही समाप्त हो गया। अगर दुर्योधन क्रोध में आकर ऐसा न करता तो शायद महाभारत का युद्ध ही नहीं होता।

कर्ण के बारे में जानकर दुखी हो गए थे युधिष्ठिर
महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद जब युधिष्ठिर को पता चला कि कर्ण उनके बड़े भाई थे तो ये जानकर उन्हें बहुत दुख हुआ। युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर का राजा बनने से भी इंकार कर दिया। तब भगवान श्रीकृष्ण और अन्य पांडवों ने युधिष्ठिर को समझाया कि दुख में सोचने-समझने की शक्ति नष्ट हो जाती है। इसलिए सोच-विचारकर ही कोई निर्णय लें। श्रीकृष्ण के समझाने पर युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर का राजा बनना स्वीकार किया।

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