2027 तक देश में 10 करोड़ नौकरियों की जरूरत, 10 राज्यों को चाहिए 8 करोड़ नौकरी

नई दिल्ली। दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या रोजगार की है और यह दिनोंदिन तेजी से बदतर होती जा रही है। दुनिया की सबसे बड़ी पेशेवर सेवा कंपनियों में शुमार प्राइसवॉटरहाउस कूपर्स (पीडब्ल्यूसी) के एक अध्ययन के मुताबिक 2027 तक भारत में 10 करोड़ लोगों के लिए रोजगार का निर्माण करना होगा। यह आंकड़ा कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 2.4 करोड़ की जनसंख्या वाले देश ऑस्ट्रेलिया में सभी लोगों को लगभग पांच नौकरी मिल सकती है। इसमें भी लगभग 80 फीसदी रोजगार का निर्माण सिर्फ 10 राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिसा, पश्चिम बंगाल, बिहार और असम में करना होगा। इन दस राज्यों में देश की 62 फीसदी जनसंख्या रहती है। अध्यनन के मुताबिक भारतीयों की औसत उम्र 27.6 वर्ष है। 50 फीसदी से अधिक भारतीयों की उम्र 25 वर्ष से कम है जबकि 65 फीसदी से अधिक लोगों की उम्र 35-25 वर्ष के बीच है।

रोजगार के विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध नहीं

90 फीसदी से अधिक कामगार अनौपचारिक रूप से देश की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान कर रहे हैं। हालांकि, केंद्र सरकार ने बेरोजगारी के वास्तविक आंकड़े पेश करने में असमर्थता दिखाई। इस पर नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने एक साक्षात्कार में कहा कि बेरोजगारी पर वास्तविक आंकड़ों के लिए घर-घर जाकर सर्वेक्षण करना होगा और 2011 के बाद से अभी तक ऐसा कोई सर्वेक्षण नहीं किया जा सका है। उन्होंने कहा कि अगर कंपनी के आधार पर रोजगार के आंकड़े तैयार किए जाते हैं जोकि अर्थव्यवस्था का सिर्फ एक ही हिस्सा होता है। इस साक्षात्कार में उन्होंने जोर देकर कहा, अगर वह कहते हैं कि रोजगार निर्माण से वह खुश हैं तो वह झूठ बोल रहे हैं और अगर इससे दुखी हैं तो इसका कोई आधार नहीं है।

बेरोजगारी लंबे वक्त तक

देश में रोजगार की समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है, इसका अंदाजा इस साल मार्च में रेलवे में 90 हजार पदों के लिए आमंत्रित आवेदन से लगाया जा सकता है। इन पदों के लिए देश भर से 2.8 करोड़ लोगों ने आवेदन किया था। विश्व बैंक के एक वरिष्ठ अर्थशास्त्री और भारतीय मामलों के विशेषज्ञ एजाज घानी ने आशंका जताई है कि भारत में रोजगार की समस्या लंबे समय तक बनी रहने वाली है। उन्होंने इसकी भी चिंता जताई कि संभवत: भारत भी वैश्विक चलन संरक्षणवाद को अपना सकता है जिसके कारण निर्माण और तकनीकी बढ़ोतरी पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। इसके अलावा डिजिटल तकनीकी के दौर में कम दक्ष और श्रमिक आधारित रोजगार कम होंगे।

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