पोर्टफोलियो का 5-10% गोल्ड में होना चाहिए: रे डेलियो

नई दिल्ली

अरबपति हेज फंड मैनेजर और ब्रिजवॉटर एसोसिएट्स के संस्थापक रे डेलियो ने ईटी नाउ की तनवीर गिल और निकुंज डालमिया से अपनी नई किताब ‘प्रिंसिपल्स फॉर नेविगेटिंग बिग डेट क्राइसिस’ पर बात की। उन्होंने बताया कि ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के 10 साल बाद आज दुनिया कहां खड़ी है और भारत कैसे कर्ज की समस्या से छुटकारा पा सकता है। पेश हैं इंटरव्यू के खास अंश:

भारत की कर्ज की समस्या के बारे में आप क्या कहेंगे? इसे कैसे बेहतर ढंग से मैनेज किया जा सकता है?

मेरा जवाब भारत और चीन, दोनों के लिए है। संतुलित ढंग से कर्ज कम करने के चार तरीके हैं। पहला सरकारी खर्च में कटौती है। इसमें यह दिक्कत आती है कि एक शख्स के खर्च घटाने से दूसरी की आमदनी कम होती है। साथ ही, यह पूरे सिस्टम के लिए काम नहीं करता। कभी-कभी बैंकरप्सी और डेट रिस्ट्रक्चरिंग से कर्ज घटाया जाता है। डेट रिस्ट्रक्चरिंग और सरकारी खर्च घटाने से महंगाई दर नेगेटिव हो सकती है, जो अर्थव्यवस्था के लिए बुरी खबर है। तीसरा तरीका अधिक नोट छापकर रिजर्व बैंक की तरफ से फाइनैंशल एसेट्स की खरीदारी है। इसे क्वॉन्टिटेटिव ईजिंग कहते हैं। चौथे तरीके में अधिक एसेट्स वालों की संपत्ति उन लोगों को ट्रांसफर करना है, जिनके पास ज्यादा संपत्ति नहीं है। इसमें वेल्थ ट्रांसफर होता है। इन सभी तरीकों के बारे में महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें संतुलन साधना होता है।

जो लोग अच्छी कंपनियों में लंबे समय तक बने रहना चाहते हैं, उनके लिए मार्केट साइकल का क्या मतलब है?

मुझे यह बात समझ में नहीं आती कि कैसे आप साइकल की अनदेखी करके बिजनेस को होल्ड कर सकते हैं। इसमें समझदारी कहां हैं। मेरे पिता ने मुझे सिखाया था कि बहुत अधिक कर्ज नहीं लेना चाहिए। उन्होंने कर्ज के खतरों के बारे में मुझे जानकारी दी थी। ऐसे में आप यह कैसे कह सकते हैं कि मैं किसी कंपनी या स्टॉक में बना रहूंगा, भले ही वह किसी भी बिजनेस साइकल से गुजर रही हो।

अभी बिजनेस साइकल में जो बदलाव आ रहा है, उसका इमर्जिंग मार्केट्स पर क्या असर होगा?

जब आप विदेशी करेंसी में कर्ज लेते हैं तो बैलेंस ऑफ पेमेंट की समस्या खड़ी होती है। इसमें पहले बुलबुला बनता है और उसके बाद आप बिजनेस साइकल के कर्ज की समस्या में फंसते हैं। अगर आपने विदेशी करेंसी में कर्ज लिया हुआ है और करेंसी की वैल्यू कम होती है तो आपकी लायबिलिटी बढ़ती है। ज्यादातर निवेशकों को लगता है कि जिस एसेट्स में गिरावट आई है, वह बुरा है और जिसमें तेजी बनी हुई है, वह अच्छा है। उन्हें यह देखना चाहिए कि जिस एसेट में गिरावट आई है, वह सस्ता हो गया है। वहीं, जिस एसेट में तेजी बनी हुई है, वह महंगा हो रहा है।

आपके हिसाब से एसेट एलोकेशन किस तरह का होना चाहिए?

एक साल पहले हमने इक्विटी में काफी निवेश किया था। उस वक्त शेयर बाजार में तेजी बनी हुई थी। अब हम साइकल के उस फेज में हैं, जहां शेयर बाजार से मुझे बहुत रिटर्न की उम्मीद नहीं है। हालात बदल गए हैं। आज इक्विटी इनवेस्टमेंट में रिस्क बढ़ा है। मुझे लगता है कि 5 से 10 पर्सेंट पोर्टफोलियो गोल्ड में होना चाहिए। सप्लाई डिमांड में असंतुलन के चलते बॉन्ड और डॉलर रिस्की एसेट्स हो गए हैं। यूरो भी कई वजहों से रिस्की दिख रहा है। जापान की करेंसी येन भी रिस्की है। ऐसे में गोल्ड हेजिंग के लिए बेहतर इंस्ट्रूमेंट है। किसी भी शख्स के पोर्टफोलियो में इसका वेटेज 5-10 पर्सेंट होना चाहिए।

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