कॉलम / वोलेटिलिटी इंडेक्स से समझिए बाजार में अभी निवेश करना है या नहीं- स्नेहा सेठ

Dainik Bhaskar

Oct 10, 2018, 11:06 AM IST

नई दिल्ली. शेयर बाजार के आकलन का एक तरीका होता है वोलेटिलिटी इंडेक्स। बाजार में जब ज्यादा उतार-चढ़ाव होता है या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक संकट की स्थिति आती है तो यह इंडेक्स बढ़ जाता है। भारतीय बाजारों में यह स्थिति अक्सर देखने को मिलती है।

वोलेटिलिटी इंडेक्स को फियर इंडेक्स भी कहते हैं क्योंकि इससे पता चलता है कि बाजार में डर कितना है। इसलिए जब इंडेक्स की वैल्यू ज्यादा होती है तो वह बाजार में घबराहट को दर्शाता है। उस समय बाजार में तेज गिरावट आती है।

वोलेटिलिटी इंडेक्स और मार्केट इंडेक्स के बीच विपरीत संबंध होता है। जब बाजार सकारात्मक होता है तब वोलेटिलिटी इंडेक्स कम होता है। बाजार में गिरावट का माहौल हो तब इस इंडेक्स की वैल्यू ज्यादा होती है।
 
वोलेटिलिटी इंडेक्स में एक महीने से भी कम समय का आकलन किया जाता है। आमतौर पर मौजूदा महीने की एक्सपायरी और अगले महीने के ऑप्शंस की वैल्यू के आधार पर इसे आंकते हैं। जब ऑप्शंस की सीरीज शुरू होती है तब मौजूदा महीने पर फोकस रहता है। लेकिन जैसे-जैसे सीरीज में आगे बढ़ते हैं, अगले महीने को इसमें शामिल करते जाते हैं। इससे वास्तविक स्थिति का पता चलता है। इनका औसत निकाल कर वोलेटिलिटी की वास्तविक स्थिति का पता लगाया जा सकता है। 

जब वोलेटिलिटी ज्यादा होती है तब ऑप्शंस की कीमत ज्यादा होती है। यह कॉल और पुट दोनों में देखा जा सकता है। भारत में वोलेटिलिटी इंडेक्स का आकलन निफ्टी ऑप्शंस के ऑर्डर बुक के आधार पर होता है। अगर ऑप्शन के पूरे सेट की कीमत ज्यादा है तो वोलेटिलिटी इंडेक्स भी ज्यादा होगा। 

आसान शब्दों में कहें तो वोलेटिलिटी इंडेक्स बाजार में वोलेटिलिटी या जोखिम को बताता है। अब देखते हैं इस इंडेक्स का इस्तेमाल कैसे करें- 

1. इक्विटी में ट्रेडिंग करने वालों के लिए वोलेटिलिटी इंडेक्स बाजार के जोखिम को मापने का अच्छा जरिया है। इंट्रा-डे और शॉर्ट टर्म ट्रेडिंग करने वालों को इससे अंदाजा हो जाता है कि वोलेटिलिटी ऊपर जा रही है या नीचे। अगर इस इंडेक्स की वैल्यू ऊपर की तरफ है तो ट्रेडर अपनी लीवरेज पोजिशन कम कर सकते हैं। 

2. वोलेटिलिटी इंडेक्स ऑप्शंस ट्रेडिंग करने वालों के लिए भी बढ़िया इंडिकेटर है। ऑप्शंस खरीदने या बेचने का फैसला वोलेटिलिटी पर निर्भर होता है। जब वोलेटिलिटी बढ़ने का अंदेशा होता है तब ऑप्शंस (कॉल और पुट दोनों) की कीमत बढ़ती है। खरीदारों को ज्यादा फायदा होता है। 

3. वोलेटिलिटी इंडेक्स शेयर बाजार के इंडेक्स मूवमेंट को भी दर्शाता है। वोलेटिलिटी इंडेक्स करीब 9 साल पहले शुरू हुआ। तब से अगर निफ्टी के साथ इसको चार्ट पर रखें तो दोनों के बीच विपरीत संबंध साफ दिखता है। वोलेटिलिटी इंडेक्स नीचे होने पर निफ्टी ऊंचाई पर होता है और जब वोलेटिलिटी इंडेक्स ऊपर होता है तो निफ्टी निचला स्तर छू रहा होता है। यह इंडेक्स में ट्रेड करने वालों के लिए बड़े काम का इनपुट होता है। 

4. वोलेटिलिटी इंडेक्स पोर्टफोलियो मैनेजर और म्यूचुअल फंड मैनजरों के लिए भी लाभदायक होता है। जब वोलेटिलिटी इंडेक्स की वैल्यू ज्यादा हो (तब मार्केट नीचे होगा) उस समय वह अच्छे शेयरों में अपना निवेश बढ़ा सकता है। 

ये लेखक के निजी विचार हैं। इनके आधार पर निवेश से नुकसान के लिए दैनिक भास्कर जिम्मेदार नहीं होगा।

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