101 साल के सेवानिवृत अध्यापक महिलाओं को देते हैं संस्कृत की शिक्षा, मिल रहे हैं पूजा के निमंत्रण

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Updated Sun, 16 Sep 2018 10:08 AM IST

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महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के छोटे से गांव मोहपदा में महिलाओं को सशक्त करने के लिए बेहद सराहनीय कदम उठाए जा रहे हैं। यह सब किया जा रहा है 101 साल के सेवानिवृत अध्यापक रामेश्वर कर्वे के प्रयासों द्वारा। वह बीते 18 सालों में 150 गैर ब्राह्मण और कम शिक्षित महिलाओं को शिक्षित कर चुके हैं। यह महिलाएं संस्कृत की डिग्री हासिल कर प्रमाणित पुजारी बन चुकी हैं।

समाज में प्रतिरोध और अस्वीकृति का सामना कर चुकी इन महिलाओं को मुंबई, थाणे और नवी मुंबई से पूजा के लिए निमंत्रण मिल रहे हैं। उन्हें जन्म, मृत्यु, गणेशोत्सव आदि सभी तरह की पूजा के लिए बुलाया जा रहा है।

इसेक अलावा वह शनि शांति पूजा भी कर रही हैं जो आमतौर पर पुरुष किया करते हैं। ये महिलाएं अपनी उपलब्धियों के लिए कर्वे का धन्यवाद करती हैं, जिन्होंने इन्हें संस्कृत शास्त्र में शिक्षित किया है।

एक महिला का कहना है कि उनके गुरुजी (कर्वे) में बहुत धीरज है क्योंकि वह मुश्किल से ही कक्षा में आ पाती थीं। घर के कामों और बच्चों के स्कूल आदि के कारण उन्हें काफी परेशानी होती थी।

गांव में पढ़ने के लिए महिलाओं को एक जगह एकत्रित करना बहुत मुश्किल काम होता है लेकिन कर्वे ने इसके लिए बहुत प्रयास किए हैं। वह अपने छात्रों को एक जगह एकत्रित करने के लिए प्रेरणादायक बातें बताते हैं।

बता दें कर्वे की कक्षा में 52 साल और इससे अधिक उम्र की महिलाएं भी उपस्थित रहती हैं। वह उनके साथ नर्सरी के बच्चों की तरह व्यवहार करते हैं। उन्हें कक्षा में आने के लिए मिठाई और पेन भी देते हैं। उनके लिए महिलाओं को संस्कृत शिक्षा देना ही जीवन का उद्देश्य है। महिलाएं घर के सारे काम निपटाकर और बच्चों को स्कूल छोड़ने के बाद पढ़ने आती हैं।

कर्वे की 62 साल की छात्रा माधुरी कावडे का कहना है कि वह उन्हें होमवर्क नहीं देते ताकि वह कक्षा में आना न छोड़ दें। वह सभी महिलाओं की परिवार के प्रति जिम्मेदारी को बखूबी समझते हैं। महिलाओं ने 6 महीने का संस्कृत भारती कोर्स किया है। जिसके चार लेवल होते हैं। प्रत्येक लेवल में उन्हें लिखित परीक्षा देनी होती है।

महिलाओं ने परीक्षा में 100 में से 80 और 90 अंक प्राप्त किए हैं। गांव में महिलाओं से कहा जाता है कि मासिक धर्म के समय श्लोकों को न पढ़े और अगर ऐसा करेंगी तो उन्हें सजा दी जाएगी।

कर्वे की एक अन्य छात्रा का कहना है कि मासिक धर्म के समय जब हम अपनी बेटियों को स्कूल जाने से नहीं रोकते तो फिर हम क्यों अपनी कक्षा में न जाएं? हमारे लिए तो वह भी स्कूल ही है। उन्होंने कहा कि आज के समय में वह आत्मविश्वास के साथ पूजा करती हैं।  

महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के छोटे से गांव मोहपदा में महिलाओं को सशक्त करने के लिए बेहद सराहनीय कदम उठाए जा रहे हैं। यह सब किया जा रहा है 101 साल के सेवानिवृत अध्यापक रामेश्वर कर्वे के प्रयासों द्वारा। वह बीते 18 सालों में 150 गैर ब्राह्मण और कम शिक्षित महिलाओं को शिक्षित कर चुके हैं। यह महिलाएं संस्कृत की डिग्री हासिल कर प्रमाणित पुजारी बन चुकी हैं।

समाज में प्रतिरोध और अस्वीकृति का सामना कर चुकी इन महिलाओं को मुंबई, थाणे और नवी मुंबई से पूजा के लिए निमंत्रण मिल रहे हैं। उन्हें जन्म, मृत्यु, गणेशोत्सव आदि सभी तरह की पूजा के लिए बुलाया जा रहा है।

इसेक अलावा वह शनि शांति पूजा भी कर रही हैं जो आमतौर पर पुरुष किया करते हैं। ये महिलाएं अपनी उपलब्धियों के लिए कर्वे का धन्यवाद करती हैं, जिन्होंने इन्हें संस्कृत शास्त्र में शिक्षित किया है।

एक महिला का कहना है कि उनके गुरुजी (कर्वे) में बहुत धीरज है क्योंकि वह मुश्किल से ही कक्षा में आ पाती थीं। घर के कामों और बच्चों के स्कूल आदि के कारण उन्हें काफी परेशानी होती थी।

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