पटना : कुल बजट का 19% शिक्षा को, आधे से ज्यादा पैसे खर्च सिर्फ वेतन पर

चालू वित्तीय वर्ष में 32 हजार 125 करोड़ रुपये शिक्षा विभाग के नाम पर

पटना : चालू वित्तीय वर्ष 2018-19 के दौरान राज्य का बजट करीब एक लाख 77 हजार करोड़ का है, जिसमें सबसे ज्यादा पैसा शिक्षा विभाग को आवंटित है. कुल बजट का करीब 19 फीसदी यानी 32 हजार 125 करोड़ रुपये का प्रावधान सिर्फ शिक्षा विभाग के लिए किया गया है. यह पहली बार नहीं है, जब शिक्षा विभाग के लिए सबसे ज्यादा बजट का प्रावधान किया गया है. पिछले कई वित्तीय वर्षों का भी यही ट्रेंड रहा है. 

हर वर्ष शिक्षा महकमा के लिए सबसे ज्यादा बजट निर्धारित किया जाता है, लेकिन इसके आधे से अधिक पैसे सिर्फ कॉलेज से लेकर स्कूल तक के शिक्षकों की सैलरी पर ही खर्च हो जाते हैं. इसमें रिटायर्ड शिक्षकों के पेंशन में दी जानी वाली राशि शामिल नहीं की गयी है. कॉलेज से लेकर स्कूल तक के शिक्षकों के वेतन पर करीब 22 हजार करोड़ रुपये सालाना का खर्च होता है. इसके अलावा पोशाक, साइकिल, छात्रवृत्ति, मेधावृत्ति, प्रोत्साहन राशि, मध्याह्न भोजन समेत ऐसी कई योजनाएं हैं, जिसमें प्रत्येक वर्ष पांच से छह हजार करोड़ रुपये खर्च होते हैं.

इस तरह के सभी तय या फिक्स खर्चों को हटाने के बाद विभाग के पास चार से पांच हजार करोड़ रुपये ही नयी योजनाएं या किसी नये कार्य पर खर्च करने के लिए बचते हैं, जो बहुत ही कम हैं. शिक्षा विभाग में वेतन समेत अन्य गैर-योजना मद में ही सबसे ज्यादा रुपये खर्च होते हैं. नयी, क्रियाशील और कुछ उन्नत योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए रुपये ही कम पड़ जाते हैं. 

योजना मद से ही होता है खर्च

शिक्षा विभाग के 32 हजार 125 करोड़ रुपये के बजट में स्थापना एवं प्रतिबद्ध व्यय मद में 13 हजार 18 करोड़ और योजना मद में 19 हजार 107 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. लेकिन, योजना मद से ही वेतन में काफी बड़ा अंश खर्च किया जाता है. सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए) केंद्रीय प्रायोजित योजना है, जिसमें राज्यांश भी 40 फीसदी के आसपास देना पड़ता है. एसएसए की राशि का बड़ा हिस्सा नियोजित शिक्षकों के वेतन पर खर्च होता है. इस बार एसएसए में करीब 10 हजार करोड़ रुपये केंद्र से आने का प्रावधान रखा गया है.

सवा तीन लाख नियोजित शिक्षक

राज्य में नियोजित शिक्षकों की संख्या करीब सवा तीन लाख और इसमें नियमित शिक्षकों की संख्या मिलाकर यह चार लाख 40 हजार के आसपास है. 

इतनी बड़ी संख्या में मौजूद शिक्षकों के वेतन में ही दो-तिहाई बजट खर्च हो जाता है. इसके बाद प्रत्येक वर्ष चलने वाली नियमित योजनाओं में करीब 1200 करोड़ के आसपास खर्च होने के बाद किसी नयी विकासात्मक योजना के लिए रुपये ही नहीं बचते हैं. 

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