ये हैं आर्थिक आंकड़े जिनका 2019 चुनावों से पहले सरकार के पक्ष में होना जरूरी है

लोकसभा चुनाव 2014 में अर्थव्यवस्था का मुद्दा अहम साबित हुआ और वोटर ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को बाहर का रास्ता दिखा दिया. मई 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बनी नई एनडीए सरकार से वोटर के अलावा वैश्विक निवेशकों ने बड़ी उम्मीद बांधी. निवेशकों को भरोसा था कि यह नई सरकार दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की अर्थव्यवस्था को न सिर्फ सही राह पर खड़ा करेगी बल्कि एक तेज रफ्तार के साथ-साथ देश के सामने खड़ी आर्थिक चुनौतियों को दूर करने का काम करेगी. लोकसभा चुनाव एक बार फिर दस्तक दे रहे हैं. मोदी सरकार निवेशकों और वोटरों की उस उम्मीद को संभवत: भूली नहीं है और अब अपने कार्यकाल के आखिरी साल में उसकी कोशिश उन आर्थिक आंकड़ों को अपने पक्ष करने की है जिनपर वैश्विक निवेशकों और वोटरों की नजर रहेगी.

जीडीपी: बीते तीन साल के दौरान देश में जीडीपी के आंकलन को लेकर विवाद की स्थिति बनी हुई है. मोदी सरकार के पहले साल के कार्यकाल के बाद 2015 में केन्द्र सरकार के सांख्यकी विभाग (CSO) ने जीडीपी के आंकलन करने के लिए निर्धारित वित्त वर्ष में बदलाव करते हुए पद्दति में भी बड़ा परिवर्तन किया. इस परिवर्तन का नतीजा यह रहा कि केन्द्र सरकार को जीडीपी विकास दर का बड़ा आंकड़ा मिला. उदाहरण के लिए देखें तो नए फॉर्मूले के मुताबिक जहां वित्त वर्ष 2013-14 में जीडीपी विकास दर 6.2 फीसदी दर्ज हुई वहीं पुराने फॉर्मूले में यह महज 4.8 फीसदी दर्ज होती है. इस दौरान खास आंकड़े उत्पादन क्षेत्र से मिलते हैं क्योंकि पुराना फॉर्मूला जहां उत्पादन विकास दर -2 फीसदी दर्ज करता है वहीं नया फॉर्मूला इसका आंकलन 6 फीसदी करता है. इस अनिश्चितता के बीच देश की वास्तविक विकास दर क्या है इसे केन्द्र सरकार को आम चुनावों सेस पहले कय करना है क्योंकि यह अनिश्चितता बनी रहने पर उसे चुनावों में नुकसान उठाना पड़ा सकता है.

पेट्रोल डीजल और महंगाई: मोदी सरकार को 2014 में देश की कमान मिलने के बाद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज होना शुरू हो गया. वहीं 2014 से पहले मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल के दौरान कच्चा तेल वैश्विक बाजार में 100 डॉलर प्रति बैरल को तोड़ते हुए देश में महंगाई का बड़ा संकट लेकर खड़ा हो गया था. वहीं 2015, 2016 और 2017 के दौरान कच्चा तेल अपने रिकॉर्ड न्यूनतम स्तर पर रहा जिसके चलते केन्द्र सरकार को राजस्व में फायदा होने के साथ-साथ महंगाई पर लगाम लगाने में बड़ी मदद मिली. लेकिन अब आम चुनावों में एक साल से कम समय बाकी है और वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत लगातार बढ़ रही है. नतीजा यह है कि मौजूदा समय में देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें अपने शीर्ष पर पहुंच चुकी है और महंगाई के बढ़ते आंकड़े केन्द्र सरकार को लगातार परेशान कर रहे हैं. इस चुनावी वर्ष में कच्चे तेल की वैश्विक कीमत में इजाफा यदि महंगाई को बेलगाम करता है तो चुनावों में विपक्ष का हमला संभालना सत्तारूढ़ पार्टी के लिए चुनौती से भरा होगा. लिहाजा, कच्चे तेल की  बढ़ती कीमतों से बढ़ रहे पेट्रोल-डीजल की कीमत पर लगाम लगाने की जरूरत है जिससे महंगाई का आंकड़ा चुनावी मुद्दा न बनने पाए.

रोजगार: केन्द्र सरकार का दावा है कि देश में रोजगार की समस्या नहीं है बल्कि रोजगार के आंकड़ों की समस्या है. बीते एक साल के दौरान कई केन्द्रीय मंत्रियों समेत प्रधानमंत्री दावा कर चुके हैं कि उनके कार्यकाल के दौरान जरूरत के मुताबिक नौकरियों का सृजन किया गया है लेकिन इनमें से ज्यादातर नौकरियां सरकारी आंकड़ों में शामिल नहीं की जा सकी हैं. सरकार की दलील है कि नए युग की नई नौकरियों की गणना करने के लिए देश में इस्तेमाल हो रहे दशकों पुराने फॉर्मूले को बदलने की जरूरत है. सरकार की इस दलील को रिजर्व बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और आईआईएम बंगलुरू से संबद्ध अर्थशास्त्री भी मानते हैं और दलील को आगे बढ़ाते हैं कि केन्द्र सरकार के ईपीएफओ के आंकड़े रोजगार की सटीक गणना करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. वहीं सेंटर फॉर इकोनॉमिक सरकार की दलील से इत्तेफाक नहीं रखते और दावा करते हैं कि देश में तेज आर्थिक रफ्तार के बावजूद जरूरत के मुताबिक नौकरियों का सृजन नहीं हो रहा है. लिहाजा, अब केन्द्र सरकार को चाहिए कि चुनावों से पहले इस मतभेद को दूर करते हुए अपना आंकड़ा सुनिश्चित करे कि क्या देश में उसके कार्याकल के दौरान रोजगार के आंकड़ों में सुधार हुआ है या नहीं.

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