'ये तो शुरुआत है अभी तो मीलों लंबी दूरी तय करनी है'

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जागरूकता के अभाव में पूर्वोत्तर से कई प्रतिभाएं सामने नहीं आ पाती हैं। मैंने यह मुकाम हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत की है। मगर मेरी यात्रा अभी शुरू ही हुई है। चलने के लिए मेरे पास एक लंबा रास्ता है।

बचपन में मैं सारे खेल खेलती थी, लेकिन मेरे गांव वाले मुझसे फुटबॉल खेलने के लिए कहते। शायद इसके पीछे की वजह यही थी कि मेरे पिता भी अच्छे फुटबॉल खिलाड़ी रहे हैं। अट्ठारह साल पहले असम के नगांव जिले के एक छोटे से गांव धींग में मेरा जन्म हुआ था। धींग भारत के उन गांवों में शामिल है, जहां आज भी मोबाइल संचार बेहतर नहीं कहा जा सकता। मैं अपने पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी हूं। मेरे पिता धान की खेती करने वाले किसान हैं।

बचपन में खेला है फुटबॉल
मेरा खेलों से जुड़ाव शुरू से ही रहा, पर न मैंने और न ही मेरे परिवार के किसी भी सदस्य ने एथलेटिक्स को कभी तवज्जो दी। मेरे पिता की आर्थिक हैसियत भी इतनी बेहतर नहीं थी कि वह मुझे खेलों में करियर बनाने के लिए जरूरी ट्रेनिंग मुहैया करा सकें। मैं फुटबॉल जरूर खेलती थी, लेकिन वह भी अपने गांव के स्कूल के बिना घास वाले मैदान पर। लड़के, लड़कियों, मैं हर किसी के साथ खेलती। थोड़ी बड़ी हुई, तो मैंने कुछ स्थानीय क्लबों के लिए भी फुटबॉल खेला और क्लबों के लिए खेलते हुए पहली दफा देश के लिए खेलने का भी ख्वाब देखा।


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