प्राकृतिक आपदा और पिता से दूर होकर यासमीन ने चढ़ी सफलता की सीढ़ी और बन गईं समाजसेवी

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सब कुछ खो जाने के बाद भी मन के एक कोने में उम्मीद जिंदा रहती है। लेकिन जब आप वह उम्मीद भी खो देते हैं, तब नियति हमारे सामने कोई ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करती है, जिससे न केवल जीवन में अच्छा करने की प्रेरणा मिलती है, बल्कि हमारे भीतर साहस भी पैदा हो जाता है। कुछ ऐसा ही मेरे साथ हुआ। करीब डेढ़ दशक पहले आई एक प्राकृतिक आपदा में मैंने अपना सब कुछ खो दिया। उसी साल परिवारिक जीवन से नाखुश होकर मेरे पिता भी हमें छोड़ कर चले गए। मैं पोर्ट ब्लेयर के एक सामान्य परिवार से ताल्लुक रखती हूं। मेरी मां एक सरकारी मुलाजिम रही हैं, पर उनकी तनख्वाह कुछ खास नहीं थी। हम लकड़ी के बने एक सरकारी घर में रहते थे, जो सुनामी में पूरी तरह बर्बाद हो गया।

मैं तब 10वीं कक्षा में थी। सुनामी के बाद हम लगभग सड़क पर आ गए। जब धीरे-धीरे हालात सुधरने लगे, तब मैंने कुछ छोटे काम करने शुरू किए और किसी तरह से 12वीं कक्षा पास की। उसके बाद नौकरी की तलाश में मैं मुंबई आ गई, ताकि अपने घर वालों की आर्थिक मदद कर सकूं और अपने दो छोटे भाइयों की पढ़ाई का खर्च उठा सकूं। मुंबई में रहते हुए मैंने मुश्किल हालात में एमबीए किया। जीवन के इस संघर्ष में मैं हिम्मत हारने लगी थी, लेकिन मैंने पाया कि इस तरह जीवन बिताने वाली मैं अकेली नहीं थी। मेरे जैसे हजारों लोग संघर्ष कर रहे थे-कुछ सड़कों पर, कुछ अनाथालयों में। इन्हीं लोगों के बारे में सोचकर मैंने गरीबों के साथ समय बिताना शुरू कर दिया।
 


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