OYO के सीईओ रितेश अग्रवाल की कहानी: सिम कार्ड बेचता था, कॉलेज की पढ़ाई भी नहीं, 22 साल में ही बन गया अरबपति

जिस उम्र में लड़के अपना लक्ष्य तय नहीं कर पाते उस उम्र में इस शख्स ने कंपनी शुरू कर दी। स्कूल तक की पढ़ाई की लेकिन कॉलेज ड्रॉपआउट कर दिया। सिम बेचकर काम चलाया। 22 की उम्र तब हुई जब अरबपति बन गया। किराये पर बजट होटल रूम्स उपलब्ध कराने में मशहूर हो चुके 'ओयो रूम्स' के सीईओ रितेश अग्रवाल की सफलता की कहानी काफी दिलचस्प तो है ही, प्रेरक भी है।

जिस उम्र में लड़के अपना लक्ष्य तय नहीं कर पाते उस उम्र में इस शख्स ने कंपनी शुरू कर दी। स्कूल तक की पढ़ाई की लेकिन कॉलेज ड्रॉपआउट कर दिया। सिम बेचकर काम चलाया। 22 की उम्र तब हुई जब अरबपति बन गया। किराये पर बजट होटल रूम्स उपलब्ध कराने में मशहूर हो चुके ‘ओयो रूम्स’ के सीईओ रितेश अग्रवाल की सफलता की कहानी काफी दिलचस्प तो है ही, प्रेरक भी है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जापान के सबसे रईसों में से एक सॉफ्टबैंक के मासायोशी सोन ओयो रूम्स के साथ पार्टनरशिप करने की सोच रहे हैं। ओयो रूम्स ने विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन में अपनी सेवा शुरू कर दी है। हाल ही में सोन ने टोक्यो स्थित अपनी कंपनी के मुख्यालय में आयोजित 38वीं आम बैठक में 23 वर्षीय रितेश अग्रवाल की दिल खोलकर तारीफ की। सोन ने कहा, ”मैं आप सभी को इस कंपनी के बारे में वाकई बताना चाहूंगा। इसका संस्थापक आज 23 वर्ष का है। जब वह 19 वर्ष का था तब उसने कंपनी शुरू की थी। महज चार वर्षों में कंपनी तेजी बढ़ रही है।”

रितेश अग्रवाल व्यवसाय वाले परिवार से ही हैं और वह दक्षिण ओडिशा एक छोटे से कस्बे बिस्सनकटक, जो कि एक नक्सल प्रभावित इलाका है, वहां से आते हैं। कॉलेज की पढाई छोड़कर वह एक लाख डॉलर की पीटर थिएल फेलोशिप पाने के पात्र बने। पीटर थिएल फेलोशिप पूर्व फेसबुक निवेशक और पेपल के सह-संस्थापक पीटर थिएल के नाम पर उन लोगों को दी जाती है जो 20 साल के कम उम्र के होते हैं और जो कुछ नया शुरू करने के लिए दो साल के लिए कॉलेज की पढ़ाई छोड़ देते हैं। यह फेलोशिप पाने से पहले 18 वर्ष की उम्र में रितेश अग्रवाल ने हॉस्पिटेलिटी की सेवाएं देने वाली अमेरिकी कंपनी AirBnB की तर्ज पर Oravel Stays की स्थापना की थी।

नए व्यवसाइयों को मॉनीटरिंग की सेवा देने वाले VentureNursery का साथ पाकर रितेश मुंबई आए और तीन महीने के कार्यक्रम के बाद 30 लाख रुपये का मूलधन जुटा लिया। ओरावेल चलाते समय रितेश सौ से ज्यादा बेड और ब्रेकफास्ट रूम्स में ठहरे और खामियों का पता लगाया। रितेश अग्रवाल ने एकबार टीओआई को बताया था कि ओरावेल के जरिये जिन पोर्ट्ल की वे सेवाएं दे रहे थे उन्हें स्टैंडर्डाइज्ड (मानकीकृत) नहीं किया गया था। उसी वक्त उन्हें थिएल फेलोशिप के लिए चुन लिया गया। इस फेलोशिप से मिली धनराशि का ज्यादातर हिस्सा कारोबार में लगाकर रितेश ने कहा था कि ”थिएल फेलोशिप की बड़ी सीख यह थी कि बड़ा सोचो और बड़ा असर पैदा करो बिना यह सोचे कि यह काम पहले किसी ने किया है।”

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