गरीब के लिए कितना फायदेमंद 'आयुष्मान भारत'

आयुष्मान भारत, राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा की नई संवर्धित योजना बताई गई है. जिसके तहत देश के 10 करोड़ गरीब और असहाय परिवारों (अनुमानतः 50 करोड़ लाभार्थी) को जोड़ा गया है. प्रति परिवार और प्रति साल पांच लाख रुपये का बीमा, अस्पताल में इलाज के लिए मिलेगा. पहले से चली आ रही दो स्वास्थ्य योजनाओं- राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना और वरिष्ठ नागरिक स्वास्थ्य बीमा योजना- का आयुष्मान भारत में विलय हो जाएगा. योजना के मुताबिक देश की 40 फीसदी आबादी बीमा लाभ के दायरे में आ जाएगी.

देश के 20 राज्यों ने केंद्रीय योजना को अपने यहां लागू करने की सहमति दे दी है. हालांकि ओडीशा जैसे राज्य ने इस योजना को ये कहते हुए लागू करने से मना कर दिया है कि इससे बेहतर बीमा के साथ वो अपने राज्य में अपनी योजना ला चुका है जिसका नाम है बीजू स्वास्थ्य कल्याण योजना. उसका दावा है कि केंद्र की योजना से राज्य के 61 लाख परिवार ही लाभान्वित हो पाएंगे जबकि उसकी अपनी योजना, राज्य के 70 लाख परिवारों को कवर कर रही है. ओडीशा का ये आरोप भी है कि केंद्र की स्वास्थ्य बीमा स्कीम, गरीब और बीमार लोगों को, भले ही लाभार्थियों के रूप में ही सही, बीमा कंपनियों के शोषण का संभावित शिकार बना सकती है. ओडीशा के अलावा दिल्ली, पंजाब और पश्चिम बंगाल ने भी अभी आयुष्मान भारत पर मुहर नहीं लगाई है.

बड़ा सवाल यही है कि क्या दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना, गरीबों को वित्तीय या स्वास्थ्य के लिहाज से कोई फायदा पहुंचाएगी या नहीं. आयुष्मान भारत स्वास्थ्य बीमा के बारे में कहा जा रहा है कि पुरानी योजनाओं से सिर्फ इस मामले में अलग है कि इसमें एश्योर्ड राशि बेहतर है. एक तरह से ये यूपीए सरकार की राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का ही अपडेटड संस्करण लगता है. देश के मौजूदा स्वास्थ्य ढांचे से जुड़े यथार्थ के संदर्भ में इसीलिए नयी योजना को लेकर चिंताएं भी हैं.

सबसे बड़ी चिंता तो निजी अस्पतालों और व्यवसायिक बीमा कंपनियों को लेकर है. योजना के दायरे में ये अस्पताल और कंपनियां हैं जिन्हें गरीबों के इलाज के लिए जोड़ा गया है. नियमों और प्रावधानो के मुताबिक तो इन्हें हर हाल में श्रेष्ठ इलाज उपलब्ध कराने की जवाबदेही तय की गई है लेकिन वास्तविकता में देखा गया है कि गरीब महंगे इलाज और महंगी दवाओं के दुष्चक्र में फंसते जाते हैं जिसका फायदा अंततः निजी अस्पताल और बीमा कंपनियां ही उठाती हैं. 2008 में लागू राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत करीब छह करोड़ परिवारों में से करीब साढ़े तीन करोड़ परिवार ही कवर हो पाए थे. रही बीमा की बात तो करीब 30 फीसदी क्लेम ही निकल पाए थे. प्रीमियम राशि के रूप में तो कंपनियों के पास बहुत अधिक धनराशि आ जाती है. इस बारे में अध्ययन और सर्वे हो चुके हैं कि किस तरह राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना अपने दावे के बावजूद गरीबों को वित्तीय संरक्षण देने में नाकाम रही और किस तरह सार्वजनिक और निजी बीमा कंपनियों और अस्पतालों को ही ऐसी योजनाओं का प्रकट अप्रकट लाभ हासिल हो जाता है.

महंगे अस्पतालों का इलाज भी जरूरी है

योजनाओं को लागू करने के लिए संस्थागत सुधारों की जरूरत है. तय पैमाने होने चाहिए. क्वालिटी की निगरानी होनी चाहिए. अस्पतालों का निरीक्षण और औचक दौरे होने चाहिए कि वहां मरीज निर्धारित समय या अनावश्यक तो भर्ती नहीं है. सूचीबद्ध अस्पतालों की गुणवत्ता और दवा वितरण भी देखा जाना चाहिए. महंगी ब्रांडेड दवाएं और उपकरणों का इस्तेमाल अगर हो रहा है तो इस बारे में पूछा जाना चाहिए. मरीज को भर्ती करने से इनकार करने वाले अस्पतालों पर भी निगरानी रखी जानी चाहिए. डॉक्टरों और नर्सों की किल्लत तो है ही, कई इलाकों में संसाधन संपन्न अस्पताल भी नहीं हैं. हेल्थ डिलीवरी सिस्टम में तमाम सुधार तभी हो सकते हैं जब इस कार्य से जुड़ी तमाम एजेंसियां और कर्मचारी साफ नीयत और निष्ठा के साथ अपना काम करें. आयुष्मान भारत योजना को पैसे की कथित उपलब्धता से ज्यादा, सुविधा मुहैया कराने की आसानी और सस्ते, सुचारू इलाज से जोड़ा जाना चाहिए.

आज आम आदमी अस्पताल जाने से इसलिए डरता है क्योंकि वो उन महंगे इलाजों का खर्च नहीं वहन कर सकता. उसे गंभीर और असाध्य रोग हो और वो इलाज के लिए किसी महंगे या सुविधासंपन्न अस्पताल का रुख करने पर विवश हो, इससे बेहतर ये है कि सरकारी अस्पतालों की दशा सुधारी जाए, उन्हें लालफीताशाही से मुक्त किया जाए. आखिर दिल्ली के एम्स जैसी चुनिंदा सरकारी संस्थाओं का अगर नाम है तो इसके पीछे उनकी कुशल, मुस्तैद और प्रशिक्षित कार्यप्रणाली भी है. अस्पताल में भर्ती होने से पहले की स्थिति में यानी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं इतनी पुष्ट, चौकन्नी और व्यापक हों कि आम आदमी सरकारी औषधालयों और केंद्रों से ही दवाएं और परामर्श लेकर लौट सके. और बीमा अगर करना ही है तो उसके दायरे में आउट पेशेंट भी होने चाहिए. बीमा कंपनियों के प्रीमियम भरने की एक जद्दोजहद और लगभग यातना से गरीबों को छुटकारा मिलना ही चाहिए.

दबाव में है भारत का हेल्थकेयर सिस्टम

या तो आप इतनी नीतिगत और नियोजन की ऐसी सक्षमता हासिल कर लें कि जर्मनी जैसे देशों की तरह ठोस सामाजिक सुरक्षा योजनाएं लागू कर सकें. जहां सोशल सिक्योरिटी की राशि में सरकार के अलावा, नियोक्ता और कर्मचारी भी अपनी आय से भागीदारी करते हैं और अस्पतालों में एक सुरक्षित और समानुभूतिपूर्ण पर्यावरण में मरीज को रखा जाता है. अकसर होता ये है कि फाइलों मे और भाषणों में नीतियां और योजनाएं विराट, भव्य और आकर्षक तो दिखने लगती हैं लेकिन व्यवहारिकता में उतरते ही उनकी चमक गिरने लगती है. जबकि व्यवहारिक तौर पर उन्हें सुदृढ़ और नागरिक हितैषी होना चाहिए. खासकर स्वास्थ्य, शिक्षा और बीमा जैसे क्षेत्र में.

(डॉक्टर के पास अगर वक्त ही ना हो, तो मरीजों का इलाज कैसे हो? एक स्टडी के मुताबिक भारत में डॉक्टर अपने मरीजों को औसतन 2 मिनट ही दे पाते हैं.)

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