कभी दिहाड़ी देने के 17 रूपए नहीं होते थे तो खुद करते थे मजदूरी, अब उठाते हैं गरीब बच्चों की पढ़ाई का खर्च

नई दिल्ली. ये एक ऐसे पिता और बेटे की कहानी है जिन्होंने दूसरों की मदद को ही अपना सपना बना लिया था। बेटे का नाम है – मिर्जा कमरुल हसन बेग। चार साल पहले इन्होंने अपने दोस्त देवेंद्र रावत के साथ मिलकर जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी के गरीब बच्चों की मदद के लिए एक फंड शुरू किया। 1990 में शुरू की गई कंपनी के लिए जब मजदूर ढूंढ़ने जाते थे तो 17 रुपए दिन की दिहाड़ी देनी होती थी। देवेंद्र और कमरुल के पास 17 रुपए मजदूरी देने के लिए पैसे भी नहीं होते थे, इसलिए खुद ही कंस्ट्रक्शन का काम किया करते थे। वहीं, देवेंद्र के पिता एक पेंटर थे, जो एक दिन में एक रुपए बड़ी मुश्किल से कमा पाते थे। 23 साल में चार हजार लोगों को दिखाया रास्ता…

– इस फंड को बनाने का सपना मिर्जा कमरुल हसन बेग के पिता फरीदुल हसन बेग ने देखा था। फरीदुल बेग ने 1962 में जामिया से ही शिक्षा हासिल की थी। उन्होंने 1995 में गरीब लोगों की मदद के लिए एक बैंक की शुरुआत की थी। इसका नाम रखा गया- जामिया कोऑपरेटिव बैंक।

– शुरु किए गए इस बैंक का मकसद जामिया यूनिवर्सिटी में पढ़ने का ख्वाब देखने वाले जरूरतमंद गरीब बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाना है। पिछले चार साल में इस फंड से करीब 400 से ज्यादा छात्रों की पूरी फीस भरी जा चुकी है। – इस बैंक की मदद से पिछले 23 साल में चार हजार से ज्यादा आपराधिक गतिविधियों में शामिल लोगों की मदद करके उन्हें नई राह दिखाई जा चुकी है। ये एेसे लोग थे, जो दिल्ली में जेबतराशी और कुछ छोटे-मोटे अपराध किया करते थे।

ऐसे किया संघर्ष, 3 हजार मेंबर जोड़े और हर किसी से दो-दो हजार रुपए की मदद ली

– मिर्जा फरीदुल बेग ने जरूरतमंद गरीबों की मदद के लिए जामिया में एक बैंक खोलने की सोची। मगर दिल्ली सरकार के सोशल वर्क विभाग में 100-150 रु. महीने की नौकरी करने वाले फरीदुल बेग के लिए बैंक खोलना आसान नहीं था। उन्होंने 3 साल के अंदर करीब 3 हजार मेंबर्स को इस मुहिम से जोड़ा। हर किसी से दो-दो हजार रुपए की मदद ली।

– पहले लोगों ने कहा कि ये चिट फंड की तरह है, पैसे डूब जाएंगे लेकिन यूपी के आजमगढ़ से दिल्ली आए फरीदुल बेग पीछे नहीं हटे। 1995 में उन्होंने जामिया कोऑपरेटिव बैंक की शुरुआत की। करीब 23 साल से यह बैंक सफलतापूर्वक चल रहा है। दिल्ली में आज इसकी 8 ब्रांच हैं।

ऐसे बढ़ी मुहिम…दोस्त देवेंद्र रावत के साथ कमरूल हसन ने शुरू की कंस्ट्रक्शन कंपनी

– मिर्जा कमरुल हसन बेग ने 1989 में जामिया से ही सिविल इंजीनियरिंग की थी। उनके साथ ही उनके दोस्त देवेंद्र रावत ने भी इंजीनियरिंग की थी। दोनों ने पांच महीने एक प्राइवेट कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम किया। इसके बाद दोनों ने खुद की कंस्ट्रक्शन कंपनी शुरू करने का निर्णय लिया। शुरुआत में कोई उपभोक्ता नहीं मिलता था। किराए के स्कूटर में दर-दर भटकते थे।

ऐसे जुटाए पैसे…एल्युमिनी और खुद से हर साल जुटाते हैं 15 लाख रु.

– बेटे कमरुल हसन और देवेंद्र रावत हर साल अपनी तरफ से 15 लाख रु. तक जुटाते हैं। इसके अलावा जामिया यूनिवर्सिटी के एल्युमिनी रहे छात्र जो आईएएस, इंजीनियर और मैनेजर बन चुके हैं, वे भी मदद करते हैं और 10 लाख रुपए तक का योगदान देते हैं।

– देवेंद्र ने बताया कि सिर्फ दिल्ली ही नहीं देशभर में जामिया के एल्युमिनी इसी तरह से लोगों और छात्रों की अलग-अलग शहरों में मदद कर रहे हैं। ये दोनों दोस्त अलग से हर साल 50 से ज्यादा एेसे छात्रों की भी मदद करते हैं, जो आईआईटी और इंजीनियरिंग कोर्सेज में दाखिला लेना चाहते हैं। उन्होंने पिछले साल ही चपरासी के बेटे को आईआईटी की मुफ्त कोचिंग दिलाई। अब वह आईआईटी चेन्नई में इंजीनियरिंग कर रहा है।

ऐसे हुई शुरुआत, हैदराबाद में टैक्सी चालक की बातों से लोगों की मदद का ख्याल आया

– मिर्जा कमरुल हसन बेग ने बताया कि वह और उनका परिवार 1992 में हैदराबाद गया था। परिवार टैक्सी से कहीं जा रहा था। इसी दौरान पिता मिर्जा फरीदुल हसन बेग ने टैक्सी चालक से पूछा कि यह टैक्सी किसकी है तो टैक्सी चालक ने जवाब दिया कि मेरी है।

– तब मिर्जा फरीदुल हसन बेग ने सोचा कि हैदराबाद में कई टैक्सी चालकों के पास खुद की टैक्सी है। दिल्ली में टैक्सी चालकों को संघर्ष करना पड़ता है और वे किराए की टैक्सी चलाते हैं। तब उन्हें ख्याल आया कि क्यों न एेसे लोगों की मदद की जाए, जो मेहनत से आगे बढ़ना चाहते हैं।

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