उदासीनता के चलते लक्ष्य अधूरे

उदासीनता के चलते लक्ष्य अधूरे

<!–—><!––> Posted On June – 18 – 2018

ग्राम न्यायालय योजना

अनूप भटनागर
देश की निचली अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या घटाने के इरादे से सरकार ने अनेक प्रयास किये हैं। इसके अंतर्गत लोक अदालत, त्वरित अदालत, सांध्य अदालत और ग्राम अदालत जैसे कई प्रयोग किये गये। सरकार ने ग्रामीणों को उनके दरवाजे पर ही न्याय सुलभ कराने के इरादे से नौ साल पहले ग्राम न्यायालय कानून, 2009 लागू किया था। इस कानून के तहत पांच हजार से अधिक ग्राम अदालतों की स्थापना की कल्पना की गयी थी लेकिन इस दिशा में अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी।
ऐसा लगता है कि न्यायाधीशों के रिक्त स्थानों पर नियुक्तियों के प्रति उदासीनता की तरह ही ग्राम न्यायालय स्थापित करने में भी राज्यों की दिलचस्पी नहीं है। देश के 29 राज्यों और सात केन्द्र शासित प्रदेशों में से अभी तक सिर्फ 11 राज्यों में केवल 343 ग्राम न्यायालयों को अधिसूचित किया जाना है लेकिन इनमें से भी सिर्फ नौ राज्यों में 210 ग्राम न्यायालय ही काम कर रहे हैं।
नौ साल पहले महात्मा गांधी के जन्म दिन पर लागू की गयी ग्राम न्यायालय योजना राज्यों की उदासीनता और केन्द्र सरकार से अपेक्षित वित्तीय सहायता के अभाव में सिसकियां भर रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले विवादों को गांव की सीमा में सुलझाने का यह प्रयास भले ही सराहनीय हो लेकिन इसके लिये केन्द्र से आर्थिक मदद मिलने के बावजूद राज्य सरकारों का इनके प्रति उदासीन रवैया लंबित मुकदमों का बोझ कम करने के प्रति उनकी नीयत को ही दर्शाता है।
विधि एवं न्याय मंत्रालय के न्याय विभाग के एक पत्र के अनुसार ग्राम न्यायालय स्थापित करने और उनके परिचालन की योजना 14वें वित्त आयोग के कार्यकाल के दौरान 31 मार्च, 2020 तक जारी रहेगी। इस पत्र में स्पष्ट किया गया था कि इस योजना हेतु दिसंबर, 2009 के केन्द्रीय सहायता संबंधी सामान्य दिशा निर्देशों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। केन्द्र सरकार ने ग्राम न्यायालय स्थापित करने हेतु राज्यों को प्रोत्साहित करने के लिये प्रति ग्राम न्यायालय 18 लाख रुपए, कार्यालय भवन हेतु दस लाख रुपए, वाहन हेतु पांच लाख रुपए और कार्यालय की साज-सज्जा हेतु तीन लाख रुपए प्रदान करने की योजना बनाई थी। इस कानून का उद्देश्य नागरिकों को उनके घर तक न्याय पहुंचाने के लिये ग्राम न्यायालयों की स्थापना करना था।
इस योजना के तहत मध्य प्रदेश में 89, राजस्थान में 45, ओडिशा में 14, महाराष्ट्र में 24, पंजाब के 22 जिलों में एक तथा हरियाणा के 21 जिलों में दो, उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में 104 ग्राम न्यायालयों को अधिसूचित किया गया था लेकिन इनमें से केवल चार और केरल में 30 ग्राम न्यायालय ही कार्यरत हैं। महाराष्ट्र में इन ग्राम न्यायालयों ने 12423 मामलों का निपटारा किया जबकि केरल ने इनमें 25018 मामलों का निपटारा किया है। जहां तक इस योजना के लिये वित्तीय सहायता का सवाल है तो केन्द्र के 2017-18 के बजट के दौरान आठ करोड़ रुपए सहित अब 52.60 करोड़ रुपए जारी किये गए हैं लेकिन इस योजना के अंतर्गत धीमी प्रगति हो रही है।
इस स्थिति के मद्देनजर संसदीय समिति ने ग्राम न्यायालय योजना को अधिक प्रभावकारी बनाने पर जोर देते हुए इनके लिये ज्यादा केन्द्रीय वित्तीय सहायता देने की सिफारिश की है। समिति महसूस करती है कि यद्यपि ग्राम न्यायालयों ने वादों के त्वरित निपटारे अथवा गरीबों के लिये इसे कम खर्चीला न्याय प्रदान करने के उद्देश्यों में सफलता प्राप्त नहीं की है लेकिन ठोस, सुनियोजित तथा निरंतर प्रयास करके इसे हासिल किया जा सकता है।
समिति ने इस तथ्य का संज्ञान लिया है कि केन्द्र सरकार राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मुख्य न्यायाधीशों से नियमित रूप से अपने यहां ग्राम न्यायालय स्थापित करने का अनुरोध करती रही है। हाल ही में केन्द्र सरकार ने सभी राज्य सरकारों से ग्राम न्यायालय योजना के अंतर्गत ग्राम न्यायालय की स्थापना करने और उनके संचालन के लिये वित्तीय सहायता मांगने का भी अनुरोध किया है।
ग्राम न्यायालयों की धीमी प्रगति के कारणों पर अप्रैल 2012 में विधि एवं गृह सचिवों तथा उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल की बैठक में चर्चा के दौरान सामने आया एक कारण तो अपेक्षित वित्तीय सहायता नहीं मिलना भी रहा। इसके अलावा अन्य कारणों में ग्राम न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को लागू करने में पुलिस अधिकारियों तथा राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों की अनिच्छा, नोटरी और स्टाम्प विक्रेताओं की अनुपलब्धता और इससे भी अधिक नियमित अदालतों के समान अधिकारी क्षेत्र की समस्या भी सामने रखी थी।
उम्मीद की जानी चाहिए कि कर्ज और सूदखोरों के जंजाल में फंसे किसानों, खेतीबाड़ी और ऐसे ही अन्य विवादों के गांव में ही समाधान के लिये राज्य सरकारें अधिक गंभीरता से नये ग्राम न्यायालयों की स्थापना करेंगी।

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